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मनीष कुमार को एक अच्छे कवि के साथ साथ एक अच्छे लेखक भी

मनीष कुमार को एक अच्छे कवि के साथ साथ एक अच्छे लेखक भी है।।

मनीष कुमार शिक्षण प्रविधियों, वैकल्पिक शिक्षा पद्धति के जानकार और प्रशिक्षक हैं जो लंबे समय से बच्चों से संबंधित विभिन्न आयामों तथा स्पेशल नीड्स बच्चों के बीच काम करते रहे हैं। इसके साथ हीं प्रगतिशील, मौलिक चिंतन और लेखन के प्रति प्रतिबद्ध हैं।
मनीष कुमार: बेगमपुर, मालवीय नगर, न्यू दिल्ली के रहने वाले है और इन्हे कई पुरस्कार से नवाजा गया है।।

1. बालकनी में लगा रहा हूँ घास
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बालकनी में लगा रहा हूँ घास
ताकी बड़े होकर इनका नाड़ उन खेतों से जुड़ सके
जहाँ रोहन नक्षत्र के आगमन के साथ
बाबूजी हिनहिना कर बैलों को रेंगाते होंगे

पानी, कादो, हेंगा करके
बोए जा रहे, होंगे धान
जल्द हीं लहलहा के उठ खड़े होंगे मोरी वाले धान

कैसे झुंड में जुटेंगे रोपनिहार
लय – ताल में गुनगुनाएंगे असाढ़ – सावन के गान
और गीले खेतों में रोपते जाएंगे धान दर धान
जो पानी के बौछारों के साथ हरित कर देंगी धरा को

घरों में माताएं बनाती होंगी पकवान
रोपनिहार गुड़, शरबत से गला तर कर
छक कर उठाएंगे बूँट दाल और भात पर अमरा अचार

घर के बालक – बुतरू के मुँह से टपकता रहेगा लार
वे मचाते रहेंगे कोहराम
घर से खेत, खेत से घर, दम – बेदम

यहाँ बालकनी में नहीं जुटते रोपनिहार
जहाँ बालकनी होते हैं वहाँ खेत नहीं होते
जहाँ खेत होते हैं वहाँ बालकनी नहीं होती
खेतों से जिनके नाड़ कट जाते हैं
वे बालकनी में उगाते हैं घास!!

2. गज में छोटी साड़ियाँ
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क्या ढपे, क्या रह जाए उघारे
ज्यामिति के किसी दुरूह प्रश्न सा
बना रहता उसके सामने
अँचरा जो काढ़े
तो कहीं और तंग पड़ जाती है
गज में छोटी साड़ियाँ

उम्र के साथ पैर पसारते देह के लिए
बजाज से ली जाती
रानी, फ़िरोजी,
बैगनी नौरंजी,
कुसुमी अँचरा वाली
थोड़ी किफायती
गज में छोटी साड़ियाँ

औरत देह को कहाँ ढक पाती है
कोई लुगा, चाहे हो पूरा थान भर
टोला भर की मर्दाना आँखें ढूँढती रहती है
अपने लिए कोई ठोह
उसके जनानी देह में

उम्र के इस पड़ाव पर
देह को देह में कसने की विशेष कला
उम्र गुजार चुकी टोला भर की पुरानी औरतें
नित्य उसके कानो में फूँका करती हैं

टोला भर के
उसके उम्र के तमाम लड़कियों को
उलझना हीं पड़ता है
अँचरा, पल्लू के बीजगणित में

3. तलाश में उनके बनफूल घरों में उग आते हैं
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मेन सड़क से
उतर रही हैं सर्पिल पगडंडियाँ
जैसे खा कर धुप लौट रहे हों सांप

घूम फिर कर ठहर जाती हैं पगडंडियाँ
जहाँ एके – दुके कुछ घर
ढ़लानों के ओट में बिखरे पड़े हैं दाने की तरह

आज फिर नहीं रुकी कोई सवारी
पगडंडियाँ फिर बैरन लौट आईं घरों को
किवाड़ों पर पड़े तालों में नहीं हुई कोई सुगबुगाहट
आज फिर वे ठंढे पड़े रह गए

एक दिन सवेरे तड़के – तड़के
इन्हीं पगडंडियों से चढ़ कर
सड़क से सवारी ले
पहाड़ी ढलानें उतर गए थे कई जोड़ी पैर

जिनसे इन पगडंडियों पर नर्मी थी
किवाड़ों का खुलने बंद होने का वास्ता था
चूल्हों में मन भर आग
जो चिमनियों को गर्म कर
आकाश से जोड़ देती थी उन्हें
सालों से अब जब नहीं लौटे वे

घरों के आँगन भरे हैं उनके इंतजार से
खिड़की, दरो-दीवार, दरवाजों
तक को उठाती है झींगुर अपने आवाज़ से

जिन घरों से घरवाले चले जाते हैं
वहाँ आईने तक पर कोई तना, तन फैला देती है
और तलाश में उनके बनफूल घरों में उग आते हैं

### मनीष कुमार

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