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बीगोद-छठवें दिन रामलीला में सीता हरण हनुमान मिलन बाली वध के बारे मे बताया

 

 

बीगोद– कस्बे के बालाजी चौक में आदर्श रामलीला कमेटी द्वारा छठवें दिन सीता हरण, हनुमान मिलन, बाली वध के बारे मे बताया जिस दौरान रामायण चौपाई का गुणगान किया गया। के प्रसंगों का सजीव चित्रण करते हुए कलाकारों द्वारा बताया कि रामायण काल में जब भगवान राम, माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण वनवास काट रहे थे, वन में घूमते – घूमते पंचवटी नामक स्थान पर पहुँचे. ये स्थान उन्हें बहुत ही रमणीय लगा और उन्होंने वनवास के अंतिम वर्षों में यही रहने का निश्चय किय इस दौरान वनवास का समय शांति पूर्ण तरीके से बीत रहा था इसी दौरान राक्षस कन्या शूर्पनखा वन भ्रमण को निकली और घूमते – घूमते पंचवटी पहुँची और वहाँ उन्होंने भगवान राम को देखा और उनके गौर वर्ण और सुन्दर रूप को देखकर उन पर मोहित हो गयी. शूर्पनखा ने सुन्दर – सा रूप धारण किया और वो भगवान राम के पास जाकर बोली कि हे राम, मैं आपसे विवाह करना चाहती हूँ, तब प्रभु श्री राम ने ये कहते हुए, ये प्रस्ताव ठुकराया कि वे विवाहित हैं और उनकी धर्मपत्नि सीता उनके साथ ही हैं और ये कहकर उन्होंने अपनी पत्नि सीता की ओर इशारा किया. तब उन्होंने लक्ष्मणजी के साथ ठिठोली करने की मंशा से शूर्पनखा से कहा, कि मेरा एक छोटा भाई हैं, वह भी मेरी ही तरह सुन्दर रूप और शरीर सौष्ठव रखता हैं और जो वन में अकेला भी हैं, तो आप उनके पास अपना प्रेमपूर्ण विवाह प्रस्ताव ले जाये, आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी.तब शूर्पनखा अपनी विवाह की इच्छा लेकर लक्ष्मणजी के पास गयी और उन्हें अपनी विवाह करने की इच्छा जताई, तो लक्ष्मणजी ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया. शूर्पनखा ने इसे अपना अपमान माना और ये सोचकर माता सीता पर हमला कर दिया, कि अगर सीता की मृत्यु हो गयी, तो राम मुझसे विवाह करने के लिए तैयार हो जाएँगे. तब लक्ष्मणजी ने क्रोध में आकर शूर्पनखा पर प्रहार किया और अपनी तलवार से उसके नाक काट दिए. इस प्रकार के अनपेक्षित प्रहार से वह दर्द और अपमान भरे मन से अपने भाई खर और दूषण के पास जाकर राम और लक्ष्मण से युद्ध करने के लिए उकसाया और कहा कि मेरे इस अपमान का बदला लो. तब खरदूषण ने राम और लक्ष्मण पर हमला किया, परन्तु दोनों ही राम और लक्ष्मण द्वारा मारे गये.खर और खरदूषण की मृत्यु के बाद शूर्पनखा और भी ज्यादा अपमानित महसूस करने लगी और पहले से भी ज्यादा क्रोध से भर गयी. इस कारण वो अपने बड़े भाई लंकापति रावण के पास गयी और रावण – रावण कहकर इस प्रकार कराहती और अपने अपमान का बदला लेने के लिए युद्ध करने के लिए उकसाया.सीता के रूप और लावण्य का विस्तृत वर्णन सुनकर रावण के मन में कुटिल विचार आ गये। साथ ही साथ वह राम और लक्ष्मण की वीरता से भी प्रभावित हुआ और समझ गया कि इन दोनों के समीप रहते हुए, वह सीता का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. वह शूर्पनखा के अपमान का बदला लेने से ज्यादा सीता के लिए लालायित था.


अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण रखने के लिए रावण अपने ‘पुष्पक विमान’ में बैठ कर राक्षस मारीच के पास गया। मारीच ने तप द्वारा कुछ ऐसी शक्तियाँ प्राप्त कर ली थी, जिससे वह कोई भी रूप धारण कर सकता था वास्तव में मारीच इस कुकृत्य के लिए इसलिए तैयार हुआ, क्योंकि उसे पता था कि उसकी मृत्यु तो निश्चित हैं, क्योंकि अगर वो ये कार्य नहीं करता हैं, तो रावण उसे मार डालेगा और यदि करता हैं तो भगवान राम उसका वध कर देंगे, तो मारीच ने प्रभु श्री राम द्वारा मृत्यु का वरण करने का निश्चय किया.
रावण ने अपनी कुटिल बुद्धि से मारीच से कहा, कि वह एक स्वर्ण मृग का रूप धारण करके सीता को लालायित करें. तब मारीच ने सुनहरे हिरण का रूप धारण किया और माता सीता को लालायित करने के प्रयास करने लगा. माता सीता की दृष्टी जैसे ही उस स्वर्ण मृग पर पड़ी, उन्होंने भगवान राम से उस सुनहरे हिरण को प्राप्त करने की इच्छा जताई. भगवान राम सीताजी का ये प्रेमपूर्ण आग्रह मना नहीं कर पाए और छोटे भाई लक्ष्मणजी को सीताजी की सुरक्षा का ध्यान रखने का उत्तरदायित्व सौंपकर उस स्वर्ण मृग को पकड़ने के लिए अपने धनुष – बाण के साथ वन की ओर चले गये. उन्हें गये हुए बहुत समय व्यतीत हो चुका था,
संध्या का समय हो रहा था, प्रभु श्री राम उस सुनहरे हिरण का पीछा करते हुए घने जंगल में जा पहुँचे थे और जब उन्हें लगा कि अब हिरण को पकड़ा जा सकता हैं, तो उन्होंने अपने धनुष से हिरण को निशाना बनाकर तीर छोड़ा, जैसे ही तीर मारीच को लगा, वह अपने वास्तविक रूप में आ गया और रावण की योजनानुसार भगवान राम की आवाज में दर्द से चीखने लगा -: “लक्ष्मण, बचाओ लक्ष्मण…. सीता, सीता….” ; इस कराहती हुई आवाज को सुनकर सीताजी ने लक्ष्मणजी से कहा कि “तुम्हारे भैया किसी मुसीबत में फँस गये हैं और तुम्हें पुकार रहे हैं, अतः तुम जाओ और उनकी सहायता करो, उनकी रक्षा करो”. ये सुनकर लक्ष्मणजी ने पुनः माता सीता को समझाया कि “भाभी, भैया राम पर कोई मुसीबत नहीं आयी हैं और ये किसी असुरी शक्ति का मायाजाल हैं, अतः आप व्यर्थ ही चिंतित न हो”.
ये सुनकर भी माता सीता ने लक्ष्मणजी की एक न सुनी और उन पर ही क्रोधित हो गयी और उन्हें आदेश दिया कि “हे लक्ष्मण, तुम जाओ और मेरे प्रभु को सकुशल ढूंढकर लाओ.” माता सीता के इस प्रकार के आदेश के कारण लक्ष्मणजी को अपने भैया राम के आदेश की अवहेलना करनी पड़ी और वे प्रभु श्री राम की खोज में जाने के लिए तैयार हो गये. परन्तु उन्होंने कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींच दी, जिसके भीतर कोई नहीं आ न सके फिर उन्होंने माता सीता से निवेदन किया कि “भाभी, ये लक्ष्मण द्वारा खिंची गयी लक्ष्मण – रेखा हैं, इसके भीतर कोई नहीं आ सकता और जब तक आप इसके भीतर हैं, आपको कोई हानि नहीं पहुंचा सकता, अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, जब तक मैं अथवा भैया राम वापस न लौट आये, तब तक आप इसके बाहर अपने चरण न रखें.” माता सीता इस बात के लिए सहमत हो गयी और कहा कि ठीक हैं, मैं इसके बाहर नहीं जाऊँगी, अब तुम प्रभु को ढूंढने जाओ. इस प्रकार के वार्तालाप के बाद लक्ष्मणजी भैया राम पुकारते हुए वन की ओर चले गये.
रावण, माता सीता का हरण करने के लिए कुटिया के पास पहुँच गया, परन्तु जैसे ही उसने कुटिया में प्रवेश करना चाहा, लक्ष्मणजी द्वारा खिंची गयी लक्ष्मण  रेखा के कारण वह भीतर प्रवेश नहीं कर पाया. रावण एक भिक्षुक का रूप धरा. भिक्षुक रूपी रावण ने माता सीता को कुटिया से बाहर बुलाने के लिए आवाज लगाई “भिक्षां देहि . माता सीता ने जब इस प्रकार की आवाजें सुनी तो वे कुटिया से बाहर आयी और भिक्षुक रूपी रावण को भिक्षा देने लगी, परन्तु वे अब भी कुटिया के भीतर ही थी और रावण उनका अपहरण नहीं कर सकता था, तब रावण ने एक और स्वांग रचा. रावण, जो कि एक संन्यासी भिक्षुक के रूप में था, क्रोधित होने का नाटक करके कहने लगा कि “किसी संन्यासी को किसी बंधन में बंधकर भिक्षा नहीं दी जाती। माता सीता जैसे बहार रावण ने उसे पकड़ षुष्पक विमान बैठाकर लंका ले गया। इस दौरान सीता बार बार राम को पुकार रही थी।रामायण सीता हरण की


रामायण काल में सबसे बड़ी घटना हुई। इस दौरान वनवास 14 वर्ष का था, जिसमें भगवान राम के साथ माता सीता और लक्ष्मणजी भी साथ थे और यदि हम कहें, कि इन दोनों के साथ होने के कारण भगवान राम की ये 14 वर्षों की वनवास की अवधि कुछ आसान रही, तो इस बात में कोई असत्यता नहीं होगी. परन्तु इन 14 सालों की अवधि में वनवास के कुछ अंतिम दिन भगवान राम और माता सीता के लिए बहुत ही कठिन थे, क्योंकि इस दौरान माता सीता का रावण द्वारा हरण कर लिया गया था. अगर हम ये कहें कि इस हरण के बाद माता सीता और प्रभु श्री राम ने बहुत ज्यादा अच्छा समय नहीं देखा या बहुत कम साथ में बिताया।रामायण काल में जब भगवान राम, माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मणजी वनवास काट रहे थे, तो वे वन में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते हुए शऋषि – मुनियों की सेवा और सहायता करते थे और साथ ही साथ उनकी पूजा – अर्चना और तपस्या को भंग करने वाले राक्षसों को दंडित करते थे और इस तरह उनकी रक्षा भी करते थे।
अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण रखने के लिए रावण अपने ‘पुष्पक विमान’ मे असली रूप में आया और उसने माता सीता का अपहरण कर लिया और उन्हें बल पूर्वक खींचता हुआ अपने पुष्पक – विमान में बैठा कर लंका की ओर प्रस्थान कर गया और इस प्रकार माता सीता का हरण हुआ. माता सीता इस क्षणिक घटना क्रम को जैसे ही समझी, उन्होंने सहायता के लिए अपने पति श्री राम और देवर लक्ष्मणजी को पुकारा, परन्तु वे उस समय बहुत दूर होने के कारण माता सीता की आवाज सुन पाने में असमर्थ थे. परन्तु माता सीता ने इस विपत्ति के समय भी बड़ी ही बुद्धिमानी से काम लिया और उन्होंने अपने जाने का मार्ग दिखाने के लिए स्वयं के द्वारा पहने हुए आभूषण धरती की ओर फेंकना प्रारंभ कर दिए, जिन्हें देखकर प्रभु श्री राम को उन तक पहुँचने का मार्ग पता चल सकें. इसी बीच माता सीता सहायता के लिए भी पुकार रही थी, जिसे सुनकर एक विशालकाय पक्षी जिसका नाम ‘जटायु’ था, वह रावण से युद्ध करने लगा, परन्तु अपने बूढ़े शरीर के कारण वह ज्यादा देर रावण का सामना नहीं कर पाया और फिर रावण ने उसके पंख काट दिये, इस कारण वह धरती पर गिर पड़ा और कराहने लगा.
दूसरी ओर भगवान राम और लक्ष्मणजी वन में मिल चुके थे और लक्ष्मणजी ने उन्हें बताया कि भाभी ने आपकी कराहती हुई आवाज सुनी और स्वयं को छोड़कर आपके रक्षण के लिए मुझे यहाँ आने के लिए विवश कर दिया. तब भगवान राम और लक्ष्मणजी समझ गये कि ये जरुर कोई असुरी शक्ति का मायाजाल हैं और सीताजी अभी संकट में हैं इस प्रकार का विचार आते ही वे दोनों कुटिया की ओर दौड़ पड़े. परन्तु वे जैसे ही कुटिया में पहुँचे, वहाँ बिखरा हुआ सामान देखकर किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत हो गये और दोनों ही सीताजी को खोजने लगे. परन्तु उन्हें कहीं भी उनका पता नहीं चला. तभी उन्हें माता सीता के आभूषण दिखाई दिए, जिसे भगवान राम पहचान गये कि ये तो सीता के आभूषण हैं और वे उसी दिशा की ओर बढ़ने लगे, जहाँ माता सीता के आभूषण मिले थे. आगे चलते – चलते उन्हें और भी आभूषण मिले और फिर कुछ ही दूर पर एक विशालकाय घायल पक्षी दिखा, यह जटायु था, जिससे पूछने पर पता चल कि माता सीता को राक्षसों का राजा, लंकापति रावण हरण करके ले गया हैं और इस प्रकार माता सीता के हरण की सही जानकारी उन्हें प्राप्त हुई.
इसी दोरान मार्ग में हनुमानजी से भेंट हुई और रामजी ने उन्हें गले से लगाया. फिर राम जी ने हनुमानजी को सभी घटना बताई. हनुमानजी ने उन्हें सुग्रीव से मिलाया और उनकी सहायता करने को तैयार हुए.। रामायण प्रसंग में आता है देवराज इंद्र का पुत्र किसी कंधा का राजा बाली जिसे लड़का था लड़ने वाला कितना ही शक्तिशाली उसकी आदिशक्ति बाली में समा जाती थी लड़ने वाला कमजोर होकर मारा जाता था। बाली ने अपनी अद्भुत शक्ति के बल पर आजा राज्यों का बल रखने वाले दुदभि भी नामक असुर का वध कर दिया था दुदभि के बाद बाली के उसके भाई मायावी का एक ही गुफा में वध कर दिया था। इस घटना के बाद बाली और सुग्रीव के बीच शत्रुता पैदा हो गई थी। बाली ने सुग्रीव की पत्नी और संपत्ति हड़प कर को राज्य से बाहर धकेल दिया था यही कारण था कि प्रभु श्री राम ने सुग्रीव से अपने बड़े भाई बालिक संयुक्त करने को कहा इसी दौरान श्री राम ने छुपकर बाली पर तीर चला दिया और वह मारा गया इस तरह बाली वध हुआ। रामलीला के दौरान रावण का किरदार माधव कीर,
जटायु का किरदार श्याम जी सुथार ,सीता का किरदार अर्जुन सोनी
,राम का किरदार दुर्गा लाल नायक, लक्ष्मण का किरदार सत्तू तेली
, शबरी का किरदार कान्हा सुथार कर रहे है ।(फोटो कैप्शन-
1- रावण द्वारा सीताहरण मामिर्क वर्णन
२- राम और सबरी मिलन)
फोटो- प्रमोद कुमार गर्ग

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