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भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित शोध कार्य सदैव समजोपयोगी हो- प्रो• जी•एस• सूर्यनारायण मूर्ति

 

रिपोर्ट अजय कुमार उपाध्याय वाराणसी

प्राचीन काल मे भी शोध कार्य ऋषि महात्मा के द्वारा होता था,सदैव समाज के उपयोगिता का ध्यान रखकर ही शोध परियोजना का निर्माण किया जाता था,आज भी नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों के अन्तर्गत शोध कार्य करने पर बल देने आवश्यकता है।
उक्त विचार आज सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के तत्वावधान में चल रहे तीन दिवसीय शोध परियोजना कार्यशाला के (द्वितीय दिवस) अन्तर्गत पंचम सत्र में “शोध प्रस्ताव योजना लेखनं च” विषय पर इंडियन सिस्टम नॉलेज (उच्च शिक्षा विभाग,भारत सरकार)नई दिल्ली के समन्वयक प्रो जी एस सूर्यनारायण मूर्ति गन्ती ने बतौर मुख्यवक्ता व्यक्त किया।

प्रो सूर्यनारायण मूर्ती ने कहा कि शोध कार्य के लिये विद्वत समाज और सामान्य जन के मध्य सामन्जस्य होना चाहिये तथा नवीन पद्धति,विधि, अवयव और उसके वैज्ञानिक पद्धति क्या और कैसा हो?इस विन्दु पर विचार करके ही शोध परियोजना तैयार किया जाता है।संचार व्यवस्था के विभिन्न माध्यमों और उनके तकनिक व उपकरण का चयन भी आवश्यक है। प्रो गन्ती ने कहा कि शोध परियोजना की तैयारी से पूर्व समय और बजट का भी प्लान करना अधिक आवश्याक है।

इस सत्र की अध्यक्षता प्रो शैलेश कुमार मिश्र ने किया।
इसके पूर्व सत्र मे “भारतीय ज्ञान प्रकल्प:शोध पद्धतिश्च” भारतीय ज्ञान परंपरा में अनुबंध चतुष्टय अधिकारी विषय पर आईकेएस डिवीजन,नई दिल्ली की समन्वयक प्रो अनुराधा चौधरी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा व उसमें निहित विधायें और उसमें निहित विज्ञान और प्रयोग का परस्पर समन्वय आवश्यक है।इसे समाज के लिये उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है इस पर बल देने जरूरत होनी चाहिये।

अध्यक्षता प्रो महेंद्र कुमार पान्डेय ने किया।संयोजक प्रो अमित शुक्ल थे।
इसके पूर्व सत्र में संस्कृत एवं प्राच्य विद्या संस्थान,जे एन यू के संकायाध्यक्ष प्रो सन्तोष कुमार शुक्ल ने बतौर वक्ता कहा कि शोध क्या है?कैसे किया जाता है व कौन कर सकता है? इस पर गहन विचार करके शोध नये दृष्टिकोण से जोड़कर करने की आवश्यकता है जिससे कोई नया निष्कर्ष व निचोड़ प्राप्त हो सके।भारतीय ज्ञान परंपरा व आधुनिक ज्ञान परंपरा के समन्वय से नये शोध आयाम तक पहुँचा जा सकता है।

अध्यक्षता प्रो रामपजन पान्डेय ने किया।
इसके पूर्व सत्र में परिचय सत्र के मुख्य वक्ता संस्कृत भारती के महासचिव महामहोपाध्याय पद्मश्री चमू कृष्ण शास्त्री ने भारतीय ज्ञान परंपरा के ज्ञान भंडार को जन जन तक शोध के माध्यम से परोसने पर बल दिया।शास्त्रों के अंदर छिपे वैज्ञानिक ज्ञान भंडार को शोध के माध्यम से जनोपयोगी बनाया जाय।
उक्त कार्यक्रम के प्रारम्भ में मंगलचारण व अतिथियों व वक्ताओं का स्वागत और अभिनंदन किया गया।
उक्त अवसर पर प्रो हरिशंकर पान्डेय,प्रो सुधाकर मिश्र,प्रो हरिप्रसाद अधिकारी,प्रो रमेश प्रसाद,प्रो हीरक कान्ति चक्रवर्ती,डॉ विजय पान्डेय,दो विद्या चंद्रा,डॉ रविशंकर पान्डेय,डॉ विजेंद्र आर्य,डॉ नीतिन आर्य,डॉ सत्येंद्र यादव व महाविद्यालयों के अध्यापक आदि उपस्थित थे।
अजय कुमार उपाध्याय
जिला रिपोर्टर
वाराणसी

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