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दीपावली पर भीनमाल सदर बाजार स्थित महालक्ष्मी के कीजिए दर्शन

 

खुद महालक्ष्मी ने ही बसाया श्रीमाल क्षेत्र ( भीनमाल )

इसीलिए मारवाड़ का सबसे धनी शहर महालक्ष्मी कृपा
– भीनमाल में मां महालक्ष्मी कमलेश्वरी का 734 साल पुराना है मंदिर, सन 1286 में हुई थी स्थापना

मनीष दवे IBN NEWS

भीनमाल :— श्रीमाल क्षेत्र भीनमाल शहर में करीब 734 साल पुराना जिले का एकमात्र महालक्ष्मी मंदिर प्रदेशभर में प्रसिद्ध है। भीनमाल शहर से खुद महालक्ष्मी का जुड़ाव भी है। श्रीमाल पुराण व हिंदू मान्यताओं के अनुसार विष्णु भायों महालक्ष्मी द्वारा ही भीनमाल नगर बसाया गया था, जिस वजह से भीनमाल का पुराना नाम श्रीमाल नगर था। साथ ही महालक्ष्मी से भीनमाल से जुड़ी कई मान्यताएं बताई जा रही है।

दरअसल, भीनमाल स्थित महालक्ष्मी का यह मंदिर 13वीं शताब्दी का है। इसका निर्माण सन 1286 में हुआ था। वर्तमान में भीनमाल में महालक्ष्मी के मंदिर है। प्राचीन मंदिर शहर के धीरायल में हैं, जहां पर बड़ी महालक्ष्मी कमलेश्वरी है तथा दूसरा मंदिर मुख्य बाजार स्थित छोटी महालक्ष्मी के नाम से है। प्रदेश के कई महालक्ष्मी मंदिरों में आज भी भीनमाल से प्रतिमा ले जाकर स्थापित की जाती है।

ये हैं मान्यताः कमल पुष्प से प्रकट हुई थी महालक्ष्मी कमलेश्वरी :—–

हरिदास नामक एक धनवान वणिक श्रीमाल नगर में रहता था। यह काफी वृद्ध था और पुत्र नहीं होने के चलते बहुत दुखी भी था। फिर भी नित्य गंध, पुष्प, अक्षत एवं कमल से भक्तिभाव से महालक्ष्मी की एक साल और तीन माह तक नियमित पूजा की थी। एक दिन रात्रि में कमलासन पर आरूढ़ महालक्ष्यों उसके सामने प्रकट हुई। नित्य कमल की पूजा से प्रसन्न देवी ने उससे बरदान मांगने के लिए कहा।

वृद्ध ने देवी लक्ष्मी से पुत्ररत्न व वंश चलने का वरदान मांगा। इस प्रकार से कौशिक के गौत्र में लक्ष्मीजी स्थापित हुई। इसीलिए आज भी भीनमाल शहर पर महालक्ष्मी का आशीर्वाद माना जा रह है। 1286 के दौरान महालक्ष्मी का मंदिर भी बना है। इस मंदिर में महालक्ष्मी के गजलक्ष्मी रूप के दर्शन होते हैं। मूल प्रतिमा के चारों ओर हाथी जलाभिषेक करते हुए दिखते हैं। इन्हें महालक्ष्मी कमलेश्वरी देवी कहा जाता है। श्रीमाली ब्राह्मण समाज के कई गौत्रों को यह कुलदेवी भी है।

श्री महालक्ष्मी पूजन का मुहूर्त श्री महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त भीनमाल निवासी मंदिर पुजारी पंडित हार्दिक भाई ने बताया कि श्री महालक्ष्मी महापूजन कार्तिक वदी अमावस्या रविवार को पूजा दिन में ——-

4.0 से 6.58 ब्रह्म मुहूर्त + लाभ वेळा

7.20 से 9.45- कि स्थिलम+चल वेका

9.40 से 12-44 लाभ + अमृत वेला+अभिजित

1.24 से 3.04 कुंभ स्थिर उग्न + शुभ वेला

4.25 से 6.0 गृहबली मेष लग्न

• पूजन- सायं – रात्रि —–

5.46 से 8.25 प्रदोष वेळा + वृषय स्थिर लग्न

5.46 से 9.04→ शुभ + अमृत वेळा

9.04 से 20.437 ग्रहबली मिथुन कन+ चल वेळा

20.12 से 12.28→

गृहबलीक

12:28 से 2.439 सिंह स्थिर लग्न

2.1 से 3.40० लाभ वेला में होगा ।

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