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सप्ताह भर चलने वाले वृक्षारोपण कार्यक्रम के अन्तर्गत वृक्ष रोपित कर आज से कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने आरम्भ किया

 

अजय कुमार उपाध्याय वाराणसी

भारतीय संस्कृति को अरण्य (वृक्षों) की संस्कृति भी कहा जाता है क्योंकि भारतीय संस्कृति और सभ्यता वनों से ही आरम्भ हुई। भारतीय ऋषि-मुनियों, दार्शनिकों, संतों तथा मनस्वियों ने लोकमंगल के लिए चिंतन-मनन किया। अरण्य (वनों) में ही हमारे विपुल वाङ्मय, वेद-वेदांगों, उपनिषदों आदि की रचना हुई।

उक्त विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय,वाराणसी के कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय के कुलपति आवास परिसर में आज पीपल के वृक्षों को रोपित कर सप्ताह भर चलने वाले इस कार्यक्रम का आरम्भ करते हुये व्यक्त किया।उन्होने कहा कि महामहिम कुलाधिपति एवं शासन के निर्देश और मंशा के अनुरुप सप्ताह भर चलने वाले इस कार्यक्रम का आरम्भ आज से हुआ जिसमें दिनांक 06 जुलाई 2021 को परिसर में वृहद् वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा।यह परिसर संस्कृत शास्त्रों और ऋषि परम्परा से युक्त है।यहाँ वेदों में वृक्षों और पर्यावरण के महत्व निहित हैं।

कुलपति प्रो हरेराम ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वृक्ष मानव के लिए स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के प्रमुख घटक के रूप में माने जाते हैं। यही कारण है कि पुरातन काल में वृक्षों का देवता के समान पूजन किया जाता था। हमारे ऋषि-मुनि एवं पुरखे इसलिये कोई भी कार्य करने से पूर्व प्रकृति को पूजना नहीं भूलते थे – शास्त्रीय दृष्टि से देखें तो तीर्थ स्थानों में वृक्षों को देवताओं का निवास स्थान माना है। वट, पीपल, आँवला, बेल, कदली, कदम वृक्ष तथा परिजात को देव वृक्ष माना गया है। भारतीय संस्कृति से धार्मिक कृत्यों में वृक्ष पूजा का अत्यधिक महत्व है। पीपल (अश्वत्थ) को शुचिद्रुम, विप्र, यांत्रिक, मंगल्य, सस्थ आदि नामों से जाना जाता है। पीपल को पूज्य मानकर उसे अटल प्रारब्ध जन्य कर्मों से निवृत्ति कारक माना जाता है।

कुलपति प्रो त्रिपाठी ने कहा कि निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि वृक्षों को सम्मान एवं पूजन अर्चन तथा वंदन तथा संरक्षण के पीछे पर्यावरण को सुरक्षित रखना था। वर्तमान में प्रकृति और पर्यावरण को बचाने, इसे फिर से संरक्षित, सुरक्षित और समृद्ध करने के लिए हमें इसके प्रति फिर से भावात्मक सम्बन्ध स्थापित करने होंगे। इसके साथ ही भारतीय वैदिक कालीन संस्कृति की  चीन मान्यताओं को सामयिक परिप्रेक्ष्य में कसौटी से कसकर फिर से हमें ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ का उद्घोष करना होगा। संस्कृति संवेदना से पनपती है और हमारे अंदर वृक्षों के प्रति जब तक गहरी संवेदना संप्रेषित नहीं होती तब तक पर्यावरण का शोषण एवं दोहन होता रहेगा।

इसके लिए आवश्यकता है एक सर्वोपरि अखण्डित अनुशासन की। जिस तरह सूर्य, चन्द्रमा, आकाश अपनी-अपनी सीमाओं में आबद्ध होकर नियमबद्ध तरीके से परिचालित हैं। इसी को मूलमंत्र मानकर पर्यावरण के अपार क्षरण को रोका जा सकता है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना का प्रतिपालन करते हुए एवं भारतीय संस्कृति के मूलमंत्र – सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत्.

की आज के पर्यावरण संरक्षण की इस विराट अवधारणा की सार्थकता है, जिसकी प्रासंगिकता आज के ग्लोबल वार्मिंग के युग में इतनी महत्वपूर्ण हो गई है। उस दौरान विश्वविद्यालय के अधिकारी,अध्यापक,कुलपति आवास के कर्मचारी एवं उद्यान अधीक्षक आदि उपस्थित थे।

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