रिपोर्ट ब्यूरो
गोरखपुर। भारत आज वैश्विक आबादी का 18ः है और वैश्विक रुप से पुरानी श्वसन संबंधी बीमारियों में दूसरे स्थान पर है। हाल ही में हुई स्वास्थ्य संबंधी देखभाल में प्रगति के बावजूद भी, भारत में अभी भी 6 करोड़ से अधिक लोग सीओपीडी से पीड़ित हैं। 2016 के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज अध्ययन के अनुसाार, मृत्यु दर के मामले में भारत आज चीन से आगे निकल गया है और पहले स्थान पर है।
वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, क्रॉनिक पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) एकमात्र बीमारी नहीं है और अम्ब्रेला शब्द है, जिसका इस्तेमाल फेफड़ों की पुरानी बीमारियों का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जो फेफड़ों के वायु प्रवाह करने में सीमाएं पैदा करती हैं। बेहद सामान्य शब्द ’क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस’ और ’एम्फेसिमा’ अब उपयोग नहीं किए जाते हैं, लेकिन अब यह सीओपीडी के निदान में यह शामिल है। सीओपीडी के सबसे आम लक्षण साँस फूलना या ’हवा की आवश्यकता’, अत्यधिक थूक बनना और पुरानी खाँसी हैं। हांलाकि, सीओपीडी केवल ’धूम्रपान करने वाले लोगों को होने वाली खाँसी’ ही नहीं होती है, बल्कि इसका निदान कम होता है, जिससे जीवन की खतरनाक फेफड़े की बीमारी होती है, जो मृत्यु का कारण बन सकती है।
इसके मूल कारणों की पहचान एम्बियंट पार्टिकुलेट मैटर पॉल्यूशन के रुप में की गई है-जो कि कारखानों, घरों कारों और ट्रकों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण है और धूम्रपान जो सभी मृत्यु के लिए तीन सर्वोत्तम जोखिमों में से दो जोखिम हैं। तीसरे जोखिम कारक में घरेलू वायु प्रदूषण शामिल है, जो बायोमास जलाने से होता है।
गोरखपुर में इस बीमारी से लगभग 70000 लोगों के ग्रसित होने का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण धूम्रपान और प्रदूषण है। गोरखपुर की आजकल की ।फप् लगभग 287 है जो कि खराब वातावरण स्थिति में आती है। उसके अलावा च्ड.2ण्5 जो कि फेफड़े के लिए अत्यंत घातक है जो लगभग 111 के स्तर पर है जो कि सामान्य की तुलना में चार गुना तक ज्यादा है।
डॉ0……………………………..के अनुसार ’यदि भारत वास्तव में देश में सीओपीडी के बढ़ते जोखिम को रोकना चाहता है, तो हमें एक श्वसन संबंधी क्रांति चाहिए और यह राष्ट्रीय सीओपीडी रोकथाम और नियंत्रण कार्यक्रम के रुप में एक ठोस राष्ट्रव्यापी प्रयास और उचित नीतिगत निर्णयों के माध्यम से ही संभव होगा।’
भारत सरकार द्वारा गैर संचारी रोग नियंत्रण (छच्ब्क्ब्ै) में सीओपीडी को जोड़कर गाँव-गाँव तक इसको श्वांस तथा उपचार के उपायों पर जोर देना होगा।
बीमारी के बारे में जागरुकता की कमी, इसके लक्षण या प्रभाव जोखिम वाले लोगों को अपने प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों से मदद लेने या जोखिम कारकों को समाप्त करने से रोकने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
साधारण श्वांस संबंधी पूछताछ और स्पाईरोमीटरी से इनका पता लगाया जा सकता है और त्वरित इलाज से नियंत्रित किया जा सकता है।
बेहतर जीवन शैली, इन्हेलर, टीकाकरण और जागरुकता से इसे बढ़ने व जानलेवा होने से बचा जा सकता है।
आईये इस विश्व ब्व्च्क् दिवस 17 नवम्बर, 2021 पर हम सब मिलकर इस पर नियंत्रण करने का आह्वाहन करते हैं और इसके जनजागरुकता अभियान को आगे बढ़ाते हैं।
तम्बाकू छोड़ें और श्वांस की लम्बी परेशानी को नजरअंदाज बिल्कुल न करें और अपने निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र पर सम्पर्क करें और सीओपीडी के बारे में जानकारी लें।