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भारतीय ज्ञान परंपरा अद्वितीय ज्ञान और प्रज्ञा का प्रतीक है-महामहोपाध्याय पद्मश्री चमू कृष्ण शास्त्री

 

रिपोर्ट अजय कुमार उपाध्याय वाराणसी

शास्त्रों पर शोध से ज्ञान विज्ञान का नवीन उदय होगा-महामहोपाध्याय प्रो वशिष्ठ त्रिपाठी।।

भारतीय ज्ञान परंपरा अद्वितीय ज्ञान और प्रज्ञा का प्रतीक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान, लौकिक और पारलौकिक, कर्म और धर्म तथा भोग और त्याग का अद्भुत समन्वय है।
नई शिक्षा नीति में अनुसंधान और उच्च शिक्षा में भी भारतीय भाषाओं पर जोर देने की बात की गई है।उक्त विचार वैश्वीक समुदाय में भारत की सांस्कृतिक राशि के प्रतिक एवं संस्कृत भारती के महासचिव महामहोपाध्याय पद्मश्री श्री चमू कृष्ण शास्त्री ने आज सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी एवं उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में पूर्वांह 11:30 बजे विश्वविद्यालय के पाणिनी भवन सभागार मे रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट पर तीन दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि कहा।उन्होने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मे निहित ज्ञान-विज्ञान को प्रायोगिक रूप में शोध के माध्यम से नवीन ज्ञान भंडार को जनोपयोगी बनाने की जरूरत है।

वर्तमान में विश्वविद्यालयों में शोध कार्य अन्तरराष्ट्रीय स्तर के होने चाहिये,प्रथम कक्षा से उच्च शिक्षा तक प्रत्येक पाठ के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा से युक्त हो।तभी राष्ट्रीयता और भारतीयता का भाव जागृत होगा।
काशी विद्वत परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष,पूर्व प्रतिकुलपति राष्ट्रपति सम्मानित प्रो वशिष्ठ त्रिपाठी ने बतौर विशिष्ट अतिथि कहा कि यह परिसर ऋषियों महर्षियों के तप का स्थल है उनके प्रतिपादन शैली है उनके मंत्रो के ऊपर शोध किये जाय तो यह समीचीन होगा।न्याय,मीमांसा,वेदान्त इत्यादि सूत्रकारों की जो सूत्र शैली है उसकी जो टीकाएँ हैं उस पर शोध होने से नवीन शोध आयाम का उदय व ज्ञान विज्ञान की नवीन धारा का प्रवाह होगा।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष डॉ वाचस्पति मिश्र ने बतौर सारस्वत अतिथि कहा कि संस्कृत भारत की आत्मा है इसी से भारत की पहचान विश्व पटल पर है।सदैव संस्कृत वाचन से विचारों की शुद्धिकरण होता है।शोध परियोजना के माध्यम से संस्कृत ज्ञान परंपरा का विकास होगा।
संस्कृत एवं प्राच्य विद्या संस्थान,जे• एन• यू•,नई दिल्ली के डीन प्रो सन्तोष कुमार शुक्ल ने कहा कि संस्कृत महाविद्यालयों में अनेक विद्वान हैं यदि उनके द्वारा शोध हेतु प्रयास किया जा रहा है तो संस्कृत मे निहित ज्ञान-विज्ञान के नवीन आयाम प्रस्फुटित होंगे।

उद्घाटन कर्ता के रूप में माता अन्नपूर्णा मन्दिर के महंत शंकरपुरी जी ने कहा कि संस्कृत विद्यार्थियों या इस संस्था के लिये सदैव हर सम्भव सहयोग मन्दिर की तरफ से किया जायेगा,संस्कृत के लिये सभी लोग मिलकर एक साथ जुड़कर उत्थान मार्ग प्रशस्त करें,संस्कृत की सेवा ही राष्ट्र भाव और सेवा है।
अध्यक्षता कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने करते हुये कहा कि संस्कृत महाविद्यालयों मे पहली बार शोध परियोजना निर्माण और शोध कार्य कराने के लिये यह प्रयास या कार्यशाला करायी जा रही है।सभी शोध के माध्यम से संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रवाह करें।

माँ अन्नपूर्णा मन्दिर के महन्त शंकरपुरी का सम्मान और अभिनंदन–
माँ अन्नपूर्णा मन्दिर,वाराणसी के महंत शंकरपुरी का विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी के द्वारा चन्दन, नारिकेल,माला,अँगवस्त्रम एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मान और अभिनंदन किया गया।
मंचस्थ अतिथियों का भी अभिनंदन और स्वागत किया गया।
मंचस्थ अतिथियों के द्वारा विश्वविद्यालय प्रकाशन संस्थान के द्वारा प्रकाशित दो अभिनव प्रकाशनों का लोकार्पण-

01- गरुणपुराणसारोद्वार:–हिन्दी व्याख्या प्रो गंगाधर पन्डा।,02- सारस्वती सुषमा: के प्रधान सम्पादक कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी,सम्पादक प्रो हरिप्रसाद अधिकारी एवं निदेशक प्रकाशन डॉ पद्माकर मिश्र हैं का लोकार्पण किया गया।

शोध कार्यशाला के प्रारम्भ मंगलाचरण प्रो महेंद्र पान्डेय,मंचस्थ अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्वलन एवं माँ सरस्वती जी के प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। संचालन एवं संयोजक प्रो हरिशंकर पान्डेय,स्वागत भाषण प्रो रमेश प्रसाद,धन्यवाद ज्ञापन डॉ रविशंकर पान्डेय ने किया।
उक्त अवसर पर मुख्य रूप से प्रो रामकिशोर त्रिपाठी,प्रो रामपूजन पान्डेय,प्रो शैलेश कुमार मिश्र,राजनाथ,प्रो अमित शुक्ल,डॉ विजय कुमार पान्डेय,डॉ लालजी मिश्र,डॉ पद्माकर मिश्र,श्री विजय कुमार मणि त्रिपाठी ,डॉ संजीव कुमार एवं संस्कृत महाविद्यालयों के अध्यापक प्रतिभागी के रूप मे उपस्थित थे।

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