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अयोध्या में नगर शैली में बन रहा एक अन्य राम मंदिर

 

अयोध्या रिपोर्टर कामता शर्मा

अयोध्या राम मंदिर के साथ उत्तर एवं दक्षिण भारत का सांस्कृतिक जुड़ाव परिपुष्ट हो रहा है। रामजन्मभूमि पर जहां उत्तर भारत की प्रतिनिधि मंदिर निर्माण कला नागर शैली में भव्य राम मंदिर का निर्माण किसी से छिपा नहीं है, वहीं रामजन्मभूमि के कुछ ही फासले पर दक्षिण भारत की प्रतिनिधि मंदिर निर्माण कला द्रविड़ शैली में मंदिर निर्माण अंतिम स्पर्श पा रहा है।
इस मंदिर का नाम श्रीरामलला देवस्थानम है और इसका निर्माण प्रख्यात कथाव्यास एवं रामानुजीय परंपरा के शीर्ष आचार्य जगद्गुरु डॉ. राघवाचार्य करा रहे हैं। उन्होंने तीन वर्ष पूर्व करीब एक एकड़ परिसर में रामलला देवस्थानम का शिलान्यास रामलला की विशेष प्रार्थना के साथ किया कि देवस्थानम का निर्माण पूर्ण होते-होते रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा और आज न केवल देवस्थानम का निर्माण पूर्ण होने को है, बल्कि डा राघवाचार्य की विशेष प्रार्थना भी फलीभूत हो उठी है।

उनकी तैयारी आगामी मकर संक्रांति के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कर कमलों से रामलला देवस्थानम का उद्घाटन कराने की है। द्रविड़ परंपरा में मंदिर को दिव्य देश कहा जाता है और स्थापत्य की शास्त्रीयता के अनुरूप दिव्य देश में गर्भगृह, अर्द्ध मंडप, पूर्ण मंडप, गोपुरम, राज गोपुरम, गरुड़ स्तंभ एवं बलि पीठ के रूप में मुख्यतया सात प्रखंड होते हैं और रामलला देवस्थानम इन सभी प्रखंडों से संयोजित है। राज गोपुरम यानी मंदिर का सिंहद्वार भव्यता और कला का शानदार उदाहरण है।

राज गोपुरम पांच तल का है। प्रत्येक तल जय-विजय की प्रतिमा से सज्जित है और संपूर्ण राज गोपुरम अनेक शिखरों-श्रेणियों के साथ भगवान के सभी 24 अवतारों तथा अनेकानेक वैैदिक एवं रामायणकालीन देव प्रतिमाओं से सज्जित है। हालांकि अकेले 55 फीट ऊंचा पूर्वाभिमुख राज गोपुरम ही नहीं गोपुरम यानी मंदिर का उत्तराभिमुख उप द्वार भी सामने वाले को ध्यानस्थ करता है। राज गोपुरम से कुछ ऊंचा गर्भगृह अगले दो-तीन माह में देव विग्रहों से युक्त होगा, किंतु देवस्थानम को अंतिम स्पर्श दिए जाने के साथ ही आस्था विसर्जित होने लगी है। दिव्य देश के समानांतर समुचित सुविधा युक्त स्वतंत्र आवासीय प्रखंड भी है, जिसमें अर्चकों एवं उनके सहयोगियों सहित बाहर से आने वाले श्रद्धालु आश्रय पा सकेंगे।

देवस्थानम के निर्माता डा राघवाचार्य के अनुसार उत्तर एवं दक्षिण का सांस्कृतिक संबंध आत्मा और परमात्मा की तरह अविच्छिन्न है। उत्तर में भगवान का जन्म हुआ और दक्षिण में भक्ति का। भक्ति भगवान बिना नहीं रह सकती और भगवान भक्ति के बिना नहीं रह सकते। यह सनातन समीकरण श्रीराम के जीवन से लेकर दक्षिण से आने वाले भक्ति की परंपरा के आचार्यों से भी सतत प्रवाहमान रहा है और राम मंदिर निर्माण के साथ यह विरासत कहीं अधिक वैभव के साथ आगे बढ़ रही है।

रामनगरी में उत्तर एवं दक्षिण भारतीय संस्कृति की एकरूपता मुहल्ला गोलाघाट स्थित अम्मा जी के मंदिर से भी होती है। यह मंदिर भी द्रविड़ निर्माण शैली का शानदार उदाहरण है। इसकी स्थापना 1904 ई. में पार्थसारथी स्वामी ने की थी। जबकि एक हजार वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में पैदा हुए महान संत एवं दार्शनिक रामानुजाचार्य ने जिस उपासना परंपरा का परिमार्जन-प्रवर्तन किया, रामनगरी में उस परंपरा के शताधिक मंदिरों से भी भारत की सांस्कृतिक एकता-एकात्मता परिभाषित है।
यहां हुआ था श्रीराम का नामकरण संस्कार: पारंपरिक मान्यता के अनुसार जिस स्थल पर रामलला देवस्थानम का निर्माण हो रहा है, वहां गुरु वशिष्ठ ने श्रीराम सहित चारो भाइयों का नामकरण संस्कार किया था।

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