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प.च.बिहार: अमीरों की शाम,गरीबों के नाम…

अमीरों की शाम,गरीबों के नाम…
पूरे देश की बात है,एक ऐंसा दृश्य जो कभी हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था,और यह कला जो राह चलते लोगों को रुकने और ताली बजाने पर मजबूर कर देती थी,और किसी किसी की आँखों मे आँसू भी यह दृश्य दे जाते थे,इन दृश्यों में एक गरीब परिवार की फटी साड़ी में अपने आप को ढंकने का प्रयास करने बाली माँ, एक अपाहिज या अंधा बाप और मैले-कुचैले कपड़े पहनी मासूमियत की प्रतिमूर्ति छोटी सी बच्ची,जिसके करतब देखकर कोई दंग रह जाता था,तो किसी के शरीर मे रोंगटे खड़े हो जाते थे,एक फूल सी नाजुक बच्ची जमीन से 10 फुट ऊपर एक पतली रस्सी पर किसी चके के सहारे चलकर करतब दिखाती है,इतना ही नही रस्सी पर चलते वक्त उसके सर पर कुछ मटकियां या फिर गगरा आदि भी रखे होते हैं,और हाथ मे एक बड़ा सा बांस जो शायद उस बच्ची से ढाई गुना बड़ा होता है,और फिर लगभग एक घंटे चलने बाले इस तमासे में कई रसूखदार और खानदानी लोग स्वयं ही किसी तमासे की तरह खड़े होक|
तमसबीन बने बड़े ही रोमांचित होते रहते हैं,इस तमासे की गूंज जहाँ तक पहुँचती है,वहाँ-वहाँ से कई लग्जरी गाड़ियों के पहिये खुद ब खुद मुड़कर इस तमासे का हिस्सा बनने पहुँच जाते हैं,और इस गरीब बच्चों के खतरनाक खेल पर उन गाड़ी बाले रईसों के बच्चे बहुत लुफ्त उठाते हैं,बदले में एक-दो या पाँच रुपये का नजराना लेकर गरीब बच्ची बहुत खुश होती है,और कहती जाती है,की जो दे उसका भी भला,जो न दे उसका भी भला,उस बच्ची के मासूम दिल से तो यह आवाज निकल ही गई के जो न दे उसका ही भला,उसकी नेकदिल आँखे अपनी तकदीर से खुश,और दुनिया से सवाल करती हुईं, की क्या यह मेरी सही जगह है,यह ऐंसा सवाल है जिसका जबाब किसी के पास नही बल्कि वर्तमान परिदृश्य में कुछ ऐंसा देखने को मिल रहा है कि यदि वह बच्ची तमासा न दिखाती और लोगों को न हंसाती तो कोई उसे कुछ नही देता,और न ही किसी को किसी के अच्छे-बुरे से मतलब है,क्योंकि यह 21वीं सदी है,मॉडर्न युग है|
डिजिटल इंडिया है,इसमे किसी के पास इतना समय नही की बगैर किसी मतलब के किसी का सुख या दुख जान सकें हाँ लेकिन यदि तमासा दिखा दे तो जरूर उसे 2-5 रुपये देकर आगे बढ़ जाएंगे,बहरहाल यह तमासे अब बहुत कम बचे हैं,यह पुरानी परंपरा जो कभी कई कबीलों के रोजगार का साधन थी,और कुछ अंश तक आज भी इनकी स्थिति जस के तस है,इनके लिए तो डिजिटल इंडिया नाम के कोई मायने नजर नही आते,और न ही इस कलाकारी को कभी कहीं भी सम्मान प्राप्त हो सका है,पूरा दिन खेल दिखाकर हजारों लोगों को हँसाने और रोमांचित करने बाली यह मासूम सी बच्चियाँ अपनी एक अल्पसमय की छाप छोड़कर किसी अगली गली में तमासा दिखाने आगे निकल पड़ती है,और यही गाना गाती है कि “जो दे उसका भी भला,जो न दे उसका भी भला,और हर मोड़ पर,हर नुक्कड़ पर दर्जनों लग्जरी गाड़ियों के पहिये इनका तमासा देखने के लिए रुक ही जाते है|
 
रिपोर्ट विजय कुमार शर्मा ibn24x7news पश्चिमी चंपारण बिहार

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