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वाराणसी-भारतीय पर्व प्रकृति और जीव जन्तु के परस्पर आत्मीय सम्बंध जोड़ने की संस्कृति है- कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी

अजय कुमार उपाध्याय रिपोर्टर ibn news वाराणसी

नाग पंचमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन माह की शुक्ल पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है। लेकिन कहीं-कहीं दूध पिलाने की परम्परा चल पड़ी है। नाग को दूध पिलाने से पाचन नहीं हो पाने या प्रत्यूर्जता से उनकी मृत्यु हो जाती है। शास्त्रों में नागों को दूध पिलाने को नहीं बल्कि दूध से स्नान कराने को कहा गया है।

उक्त विचार आज पूर्वांह सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने नागपंचमी पर्व पर आज बाबा विश्वनाथ जी,संकटमोचन और माँ दुर्गा देवी के दर्शन-पूजन के पश्चात् पूजन और भारतीय संस्कृति विषय पर वार्ता के दौरान व्यक्त किया।

कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने बताया कि हिन्दू संस्कृति ने पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति(प्रकृति) सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया है। हमारे यहां गाय की पूजा होती है। कई बहनें कोकिला-व्रत करती हैं। कोयल के दर्शन हो अथवा उसका स्वर कान पर पड़े तब ही भोजन लेना, ऐसा यह व्रत है। हमारे यहाँ वृषभोत्सव के दिन बैल का पूजन किया जाता है। वट-सावित्री जैसे व्रत में बरगद की पूजा होती है, परन्तु नाग पंचमी जैसे दिन नाग का पूजन जब हम करते हैं, तब तो हमारी संस्कृति की विशिष्टता पराकाष्टा पर पहुंच जाती है।

कुलपति प्रो त्रिपाठी ने बताया कि कई भारतीय पौराणिक कथाओं में नाग और मनुष्य का गहरा संबंध बताया गया है। माना जाता है कि शेषनाग के सहस्त्र फनों पर ही पृथ्वी का भार है। भगवान विष्णु भी क्षीरसागर में शेषशय्या पर विश्राम पाते हैं। शिवजी के गले में सर्प हार है।कृष्ण-जन्म पर नाग देवता की सहायता से ही वसुदेव यमुना पार करके वृंदावन आते हैं।
कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने बताया किसमुद्र-मंथन के समय देवताओं की मदद के लिए वासुकि आगे आए थे। वर्षा ऋतु में जब सांपों के बिल में पानी भर जाता है तो वह बाहर निकल आते हैं और तब उन्हें मारा न जाए बल्कि उन्हें सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया जाए इसकी स्मृति कराने के लिए ही संभवत श्रावण मास में यह पर्व आता है।

कुलपति प्रो त्रिपाठी ने बताया कि गाय, बैल, कोयल इत्यादि का पूजन करके उनके साथ आत्मीयता साधने का हम प्रयत्न करते हैं, क्योंकि वे उपयोगी हैं। लेकिन नाग हमारे किस उपयोग में आता है, उल्टे यदि काटे तो जान लिए बिना न रहे। हम सब उससे डरते हैं। नाग के इस डर से नागपूजा शुरू हुई होगी, ऐसा कई लोग मानते हैं, परन्तु यह मान्यता हमारी संस्कृति से सुसंगत नहीं लगती। नाग को देव के रूप में स्वीकार करने में आर्यों के हृदय की विशालता का हमें दर्शन होता है। ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्‌’ इस गर्जना के साथ आगे बढ़ते हुए आर्यों को भिन्न-भिन्न उपासना करते हुए अनेक समूहों के संपर्क में आना पड़ा। वेदों के प्रभावी विचार उनके पास पहुँचाने के लिए आर्यों को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा।

विभिन्न समूहों को उपासना विधि में रहे फर्क के कारण होने वाले विवाद को यदि निकाल दिया जाए तो मानव मात्र वेदों के तेजस्वी और भव्य विचारों को स्वीकार करेगा, इस पर आर्यों की अखण्ड श्रद्धा थी। इसको सफल बनाने के लिए आर्यों ने अलग-अलग पुंजों में चलती विभिन्न देवताओं की पूजा को स्वीकार किया और अलग-अलग पुंजों को उन्होंने आत्मसात करके अपने में मिला लिया। इन विभिन्न पूजाओं को स्वीकार करने के कारण ही हमें नागपूजा प्राप्त हुई होगी, ऐसा लगता है कि भारतीय संस्कृति सभ्यता और ऋषि परम्पराओं ने प्रकृति और जीव- जन्तु का आपसी सामन्जस्य बैठाने का सर्वदा प्रयास किया है जिसका उदहारण भारतीय पर्व हैं।

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