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भारतीय स्वाधीनता संग्राम और असम के क्रान्तिकारी

भारतीय स्वाधीनता संग्राम और असम के क्रान्तिकारी

श्रीमन्त शंकरदेव की पावन धरा भारतीय संस्कृति के ख्यात उद्घोष “वीरभोग्या वसुन्धरा” को चरितार्थ करती है। पूर्वोत्तर के द्वार कहे जाने वाले असम प्रदेश के क्रान्तिकारियों ने अपने द्वार पर ही ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया था| दुर्भाग्य से एकपक्षीय ऐतिहासिक लेखन ने उनके नामों को भारतीय आम जनमानस तक नहीं जाने दिया और उन्हें विस्मृत कर दिया गया, किन्तु साम्प्रतिक ऐतिहासिक पुनर्लेखन में उन भूले हुए क्रान्तिकारियों को याद करना अब हम सभी की जिम्मेदारी बन जाती है। असम की इस धरा पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विरोध का बिगुल बजाने वाले कनकलता बरुआ, भोगेश्वरी फुकनानी, पुष्पलता दास, चन्द्रप्रभा सैकियानी, मणिराम दीवान, कुशल कोंवर, शंभुधन फुंगलो, भोगोई देवी, बोधुरा कोच, हरि डेका, धनदेव सरमा आदि जैसे अप्रतिम क्रान्तिकारी हुए हैं।
कनकलता बरुआ का जन्म 1924 में असम प्रान्त में हुआ और बालपन से ही वे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित हो गईं। मात्र 7 वर्ष की छोटी आयु में ही उन्होने 1931 के वर्ष में ब्रिटिश विरोधी रैलियों में भाग लिया। 1942 के भारत छोडो आन्दोलन में उन्होने असम की ओर से क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया। ब्रिटिश फौज के समक्ष वे हाथ में तिरंगा लेकर अपने सहयोगियों के आत्मबल में वृद्धि करते हुए आगे आईं और ब्रिटिश गोलीबारी में उन्होने अपनी जान भारतमाता के चरणों में न्यौछावर कर दी। किन्तु, आज वही तिरंगा लिये हुए असम की दीवारों पर उभरे और चित्रांकित दृश्य उनके बलिदान की गाथा गा रहे हैं।
भोगेश्वरी फुकनानी (1872-1942) एक जिजीविषा वाली क्रान्तिकारी महिला थीं। असम के नौगांव जिले के बहरामपुर कस्बे में उन्होने 70 वर्ष की आयु में ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व किया। इन्होने व्यक्तिगत प्रयास से स्थानीय महिलाओं का एक संगठन बनाकर उन्हें भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सहभागिता हेतु प्रेरित किया। भारत छोडो आन्दोलन (1942) के दौरान ब्रिटिश कैप्टन फिंस के द्वारा चलाई गई गोली से इन्हें वीरगति प्राप्त हुई। पुष्पलता दास (जन्म – 27 मार्च, 1915) का सम्बन्ध असम के उत्तर लखीमपुर से रहा है। यह एक प्रतिष्ठित समाजसेवी और सक्रिय आन्दोलनकारी महिला थीं। मात्र 11 वर्ष की आयु में इन्होने “मुक्ति संघ” नामक संगठन बनाकर राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग लिया। उन्होंने भगत सिंह की फांसी का पुरजोर विरोध किया था। वे राष्ट्रीय स्वाधीनता हेतु संघर्षरत “राष्ट्रीय योजना समिति” (1940-42) की सक्रिय कार्यकर्त्री रहीं और भारत छोडो आन्दोलन में अपने सफल नेतृत्व का परिचय दिया। स्वातन्त्र्योत्तर भारतीय राजव्यवस्था में इन्होने सांसद के उत्तरदायित्त्व का निर्वहन भी किया था।
चन्द्रप्रभा सैकियानी (जन्म – 24 दिसम्बर, 1901) का सम्बन्ध असम के कामरूप जिले से है। युवावस्था में वह एक अध्यापिका और बाद में प्रधानाध्यापिका भी बनी। उन्होने गांधी जी के स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया और प्रधानाध्यापिका के दायित्व से त्यागपत्र देकर एक “महिला मोर्चा” बनाया और अपना जीवन भारतमाता के चरणों में समर्पित कर दिया। असम में ब्रिटिशर्स के विरोध के अतिरिक्त, इन्होने शिक्षा के लिए प्राथमिक विद्यालय खोला, किशोरों को नशे की लत से मुक्त कराने हेतु “अफीम निषेध आन्दोलन” में भी सहभागिता की। भारतीय परिप्रेक्ष्य में दिये जा रहे नारे “स्वदेशी अपनाओ” का इन्होने घर-घर जाकर प्रचार किया और अंग्रेजी सामान के बहिष्कार की बात की। भारत छोडो आन्दोलन में कामरूप जिले का इन्होने नेतृत्व किया और अपनी आँखों के सामने इन्होने भारतीय स्वाधीनता प्राप्त होते हुए भी देखी।
ऐसे ही क्रान्तिकारी थे – मणिराम दीवान। 24 दिसम्बर, 1806 में जन्मे दीवान ने जोरहाट में अपना पहला स्वदेशी चायबागान लगाया। वे 1857 की क्रान्ति से प्रभावित थे और इसीलिए उन्होने अपने जीवन का अधिकांश समय ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन में लगाया। एक अन्य क्रान्तिकारी कुशल कोंवर (जन्म – 1905) भी हुए, जिनका सम्बन्ध असम प्रदेश के गोलाघाट जिले से रहा है। इन्होने भारतीय स्वाधीनता हेतु आयोजित असहयोग आन्दोलन, सत्याग्रह आन्दोलन और भारत छोडो आन्दोलन – इन तीनों आन्दोलनों में महती भूमिका निभाई। वर्ष 1942 में इन्हें अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया और बिना उनका सही से पक्ष जाने, 15 जून, 1943 को सुबह फांसी लगा दी। ऐसे वीर को आज पूरा असम याद करता है और इनकी गाथा अब भारत का आम जनमानस भी जानेगा। शंभुधन फुंगलो (1850-1883) ने असम के कछारी क्षेत्र में ब्रिटिशर्स के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। इन्होने अंग्रेजों द्वारा विभक्त किये गए कछारी क्षेत्र के युवाओं को सैन्य-प्रशिक्षण देकर सशस्त्र विद्रोह हेतु एक बृहद् सैन्य-क्षमता अर्जित की और ब्रिटिशर्स के खिलाफ आवाज बुलन्द की।
इसके अतिरिक्त भी असम के ऐसे अनगिनत क्रान्तिकारी हुए हैं, जिन्होने भारतमाता के श्रीचरणों में हंसते-हंसते अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। आज आजादी के अमृत महोत्सव में हम सभी का कर्त्तव्य है कि हमारी स्वाधीनता हेतु प्राण न्यौछावर करने वाली इन हुतात्माओं को नमन करें।

आलेख लेखक : (डॉ.पवन तिवारी, पूर्वोत्तर क्षेत्र संगठन मन्त्री, विद्याभारती)

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