रिपोर्ट ब्यूरो
गोरखपुर । चार मोहर्रम का बहुत ही कदीमी ( पुराना ) मातमी जुलूस जो बसंतपुर स्थित मरहूम मोहम्मद मेहंदी (एडवोकेट) साहब के घर से निकलता था। जुलूस में शिया समुदाय के लोग चाकू, छुरी, जंजीर, और हाथ का मातम करते हुए हालसीगंज, घंटाघर, रेती होते हुए निकट गीता प्रेस इमामबाड़ा अशरफुननिशा खानम पर जाकर समाप्त होता था । गवर्नमेंट गाइड लाइन और परमिशन न होने की वजह से यह जुलूस इस साल भी स्थगित रहा। शिया कम्युनिटी के हर नौजवान ने अपने जोश और जज्बे को दबाते हुए भारी मन से घर में ही अलम सजाया और कोविड गाइडलाइन का पालन करते हुए मातम करके वही समाप्त कर दिया।
शिया कम्युनिटी के लोग यह मातम जंजीर चाकू छुरी से इमाम हुसैन की कर्बला की शहादत की याद में करते हैं कि अगर उस समय हम लोग होते तो इमाम हुसैन का साथ देते और अपनी जान इमाम हुसैन पर कुर्बान कर देते।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की कर्बला में यह कुर्बानी, नाइंसाफी को खत्म करने के लिए थी। इसलिए हर साल मोहर्रम में इस कुर्बानी की याद सिर्फ मुसलमान ही नहीं मनाते बल्कि हर वह इंसान बनाता है जो इंसाफ पसंद है चाहे उसका संबंध किसी भी धर्म और मजहब से हो।
जब कभी हम दुनिया में आतंकवाद, भ्रष्टाचार ,और जुल्म देखें और अपने आप को अकेला महसूस करें तो कर्बला के पैगाम को याद करें जो हमें याद दिलाता है कि अगर जुल्म के खिलाफ मुकाबले में अकेले हो या तादात में कम हो तो थक कर घर में न बैठ जाना सच्चाई की राह पर अगर कदम आगे बढ़ आओगे तो याद रखो कि जीत हमेशा सच्चाई की होगी फिर चाहे वह सच्चाई के लिए तुम्हें अपनी जान क्यों न देनी पड़े।
इतिहास गवाह है कि जालिम यजीद सारे जुल्म करने के बाद भी अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका और हार गया लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जान देकर के भी जीत गए क्योंकि वह जुल्म के आगे नहीं झुके और इंसानियत को बचा लिया । इस्लाम अमन का मजहब है जो यह सिखाता है कि इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं अगर आप एक अच्छे इंसान नहीं तो आप एक अच्छे मुसलमान भी नहीं बन सकते।
इन्हीं सारी बातों की याद में मोहर्रम मनाया जाता है और यह जुलूस व अलम निकाले जाते हैं लेकिन पिछले वर्ष की तरह कोरोना के कारण इस साल भी यह जुलूस स्थगित रहा।