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इमाम हुसैन की याद का पर्व है चेहल्लुम

 

संवाददाता मुदस्सिर हुसैन IBN NEWS मवई अयोध्या

अमन आमान से मना नेवरा का चेहल्लुम

इस्लाम ज़िंदा होता है हर करबला के बाद॥’

30/09/2021 मवई अयोध्या – इजादारी या ताजियादारी रीतिगत रूप से कोई खुशियों और उल्लास का त्योहार नहीं है। यदि समाज का कोई समूह यह मानता है कि इसका आयोजन किसी की मौत की खुशी में होता है तो यह उसका भ्रम है। इसका आयोजन निस्संदेह इस्लाम धर्म के लिए हज़रत मुहम्मद (स.) के निवासे इमाम हुसैन की सेवाओं और उनके बलिदानों को स्वीकार करना है। इमाम हुसैन का व्यक्तित्व हमेशा से बलिदान का आदर्श रहा है। उससे बड़ा बलिदान इस नश्वर संसार में विरले ही मिलेगा। इमाम हुसैन का युग इस्लामी इतिहास में ऐसा युग था, जिसमें इस्लाम के विरुद्ध ऐसी शक्तियां उठ खड़ी हुई थीं, जो सीधे-साधे मुसलमानों को अपना निशाना बनाती थीं। ऐसे में हज़रत हुसैन ने (रज़ि) इस्लाम की खोई हुई गरिमा को वापिस लाने और उसे सुदृढ़ करने का भरसक प्रयास किया, यहां तक कि इस पथ पर चलते हुए उन्होंने अपने जान की भी परवाह नहीं की।

वस्तुत: इज़ादारी असत्य पर सत्य की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। वास्तव में चेहल्लुम हज़रत हुसैन की शहादत का चालीसवां होता है। इस दिन न केवल भारत, बल्कि संपूर्ण विश्व में चेहल्लुम का आयोजन किया जाता है। वास्तव में इसका रिश्ता तो ‘मरग-ए-यज़ीद’ से है। क्या खूब कहा था सुप्रसिद्ध उर्दू कवि व स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने-
‘कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मरग-ए-यज़ीद है।
इस्लाम ज़िंदा होता है हर करबला के बाद॥’

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