राकेश पाण्डेय
30 अप्रैल 2025 की शाम, जब देश भर में पहलगाम हमले की गूंज के बीच सख़्त कार्रवाई की मांग उठ रही थी और पूरा मीडिया युद्ध जैसे माहौल को हवा दे रहा था, तभी केंद्र सरकार ने एक ऐसा फ़ैसला लिया, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने घोषणा की कि आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जाति आधारित गणना भी शामिल की जाएगी।
यह फ़ैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की समिति (CCPA) की बैठक के बाद लिया गया। लेकिन यह घोषणा न सिर्फ़ टाइमिंग को लेकर बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थों को लेकर भी सवालों के घेरे में है।
क्या यह विपक्ष की जीत है?
जाति जनगणना की मांग वर्षों पुरानी है। राहुल गांधी लगातार इसके लिए सरकार पर दबाव बना रहे थे। 2023 में बिहार में महागठबंधन सरकार ने जातिगत सर्वे कराया था, जिसकी सफलता ने राष्ट्रीय स्तर पर इसकी मांग को हवा दी।
राहुल गांधी ने इस फ़ैसले को “हमारा विज़न” बताते हुए कहा कि सरकार ने विपक्ष का एजेंडा अपनाया है। उन्होंने तेलंगाना मॉडल की भी तारीफ़ की, जहां कांग्रेस सरकार ने बेहद पारदर्शी और तेज़ी से जाति सर्वे किया था।
बीजेपी का यू-टर्न?
पिछले वर्षों में बीजेपी और उसके नेता जाति जनगणना का विरोध करते रहे हैं। कभी इसे हिंदू समाज को तोड़ने की साजिश बताया गया तो कभी विकास विरोधी एजेंडा। लेकिन अब वही बीजेपी इस फ़ैसले का स्वागत कर रही है।
अश्विनी वैष्णव ने इसे समाज के सशक्तिकरण की दिशा में कदम बताते हुए कहा कि अब पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य जनगणना में ही जातिगत आंकड़े लिए जाएंगे।
राजनीतिक मकसद या सामाजिक न्याय?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस ऐलान का सीधा संबंध बिहार चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव से है। बीजेपी पिछड़े वर्गों के सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है और नीतीश कुमार जैसे नेताओं को घेरने का यह एक नया तरीका हो सकता है।
अखिलेश यादव ने इसे PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की जीत बताते हुए कहा कि यह फ़ैसला भाजपा की हार की शुरुआत है।
तेजस्वी यादव ने इसे वैचारिक जीत बताया और कहा कि अब समय है कि विधानसभा, लोकसभा और विधानपरिषद में पिछड़ों के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
वाम दलों का रुख
सीपीआई-एम, सीपीआई, और माले ने सरकार के फ़ैसले का स्वागत तो किया, लेकिन इसकी टाइमिंग और गंभीरता पर सवाल उठाए। एम.ए. बेबी ने कहा कि सरकार ने समय सीमा तय नहीं की है, और केवल घोषणा कर “चेहरा बचाने” की कोशिश कर रही है। डी. राजा ने 50% आरक्षण की सीमा हटाने और नौकरियों में बढ़ोतरी की मांग की।
जनगणना कब होगी?
भारत में आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी। 2021 में इसे कोविड-19 के कारण टाल दिया गया और अब तक शुरू नहीं हो सकी है। जाति जनगणना जोड़ने से प्रक्रिया और जटिल होगी। सरकार ने कोई निश्चित तारीख नहीं बताई है, लेकिन दावा किया है कि “जल्द शुरुआत” होगी।
जाति जनगणना का इतिहास
1881: पहली बार ब्रिटिश शासन में जाति आधारित जनगणना।
1931: आखिरी बार सभी जातियों की गणना हुई।
1951-2011: केवल SC-ST की गिनती हुई।
2011: UPA सरकार में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना हुई, लेकिन आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए।