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भिखारी ठाकुर सामाजिक चेतना के अग्रदूत थे- डॉ रागिनी

 

रिपोर्ट योगेश श्रीवास्तव

गोरखपुर। अखिल भाग्य महाविद्यालय रानापार में नटसम्राट भोजपुरी में नाटक लिखकर हिंदी के आधुनिक रंगमंच को विदेशिया से पूर्ण करने वाले लोक कला के अग्रदूत शिल्पकार भिखारी ठाकुर सारण बिहार के रहने वाले थे। उक्त बातें अखिल भाग्य महाविद्यालय रानापार की प्राचार्य डॉ रागिनी राय ने कही। भिखारी ठाकुर के चरित्र पर प्रकाश डालते हुए आगे भी कहती हैं कि भिखारी ठाकुर प्रतिभा के धनी थे। उनकी मातृभाषा भोजपुरी थी। उन्होंने भोजपुरी कोई अपने काव्य और नाटक की भाषा बनाया। विदेशिया नाटक की शुरुआत सन 1910 में प्रकाशित की गई थी। बड़े पैमाने पर मंचन चलता रहा जहां भी खेला जाता था वह हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी उनके नाटकों में लोगों को अंत तक बांधने की एक अद्भुत कौशल विद्यमान थी उनके इन्हीं सब नाटकों व प्रतिभा को पहचानकर तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने राय साहब की उपाधि से विभूषित किया था। भिखारी ठाकुर एक नाटककार ही नहीं बल्कि एक सच्चे देशभक्त व समाज सुधारक भी थे। जो अपने नाटकों के माध्यम से लोगों के जेहन में समाज वह देश के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा दी। और लोगों के दिल में अपनी एक जगह बनाई। विदेशिया बेटी बेचवा गबड्डीचोर विधवा विवाह इन सभी नाटकों में उन्होंने नारी को केंद्रित किया हुआ जो समकालीन स्त्री विमर्श मानवीय संवेदना तथा ग्रामीण जीवन की विसंगतियां और विडंबना को समझने की प्रेरणा देते हैं तत्कालीन परिस्थितियां क्या थी यह सब पता करने के लिए भिखारी ठाकुर के नाटक आज भी प्रासंगिक है।

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