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बेचूबीर बाबा धाम मेला मीरजापुर

मनरी की थाप और पुजारी की चिंघाड़ के साथ संपन्न हुआ ऐतिहासिक बेचूबीर मेला

मीरजापुर। अहरौरा क्षेत्र के बरही गांव स्थित ऐतिहासिक बेचूबीर धाम में आयोजित तीन दिवसीय प्रसिद्ध बेचूबीर मेला रविवार की भोर में मनरी की थाप और पुजारी की चिंघाड़ के साथ संपन्न हो गया। मध्य रात्रि के ठीक बाद जब वातावरण में फैले कोलाहल को मनरी की तेज ध्वनि ने भंग किया, तब हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालु बाबा की चौरी की ओर खिंचे चले गए। इस क्षण को मेले का महानिशा कहा जाता है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।

मेले के दौरान भूत-प्रेत बाधा, अदृश्य शक्तियों और संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर पहुंचे श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं दिखी। हजारों महिलाएं और पुरुष बाबा की चौरी के सामने भूमि पर बैठकर ध्यान, नृत्य और प्रलाप की अनूठी अवस्थाओं में दिखाई दिए। मान्यता है कि मनरी की थाप लगने के बाद बेचूबीर बाबा की कृपा से बाधाओं का निवारण होता है।


तीन दिनों तक चलता है भूतों का मेला

लोक मान्यता के अनुसार, इस धाम में आने मात्र से तथाकथित भूत-प्रेत, डायन-चुड़ैल जैसी अदृश्य बाधाओं से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि इस मेले को “भूतों का मेला” भी कहा जाता है। भक्त मानते हैं कि बाबा बेचूबीर का स्मरण और चौरी पर माथा टेकने से:

  • संतान की प्राप्ति होती है

  • असाध्य मानी जाने वाली बीमारी दूर हो जाती है

  • मन की पीड़ा और मानसिक कष्ट समाप्त हो जाते हैं

इस वर्ष भी बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश सहित उत्तर प्रदेश के कई जिलों — सोनभद्र, चंदौली, बनारस, बलिया, गाजीपुर, प्रयागराज आदि से लाखों श्रद्धालु धाम पहुंचे।


बेचूबीर बाबा और बरहिया माता की कथा

लोकश्रुति के अनुसार लगभग 400 वर्ष पूर्व बरही क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था। पटीहटा गांव के शिवभक्त बेचू यादव अपने पशु चराने आए थे। इसी दौरान जंगल में एक बाघ ने तीन दिनों तक उनसे संघर्ष किया, अंततः तीसरे दिन बेचू यादव वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी पत्नी ने अपने बारह दिन के शिशु को लेकर सती हो गईं, जिन्हें आज बरहिया माई के नाम से जाना जाता है।

उनकी समाधि स्थली से धीरे-धीरे चमत्कारिक घटनाएँ होने लगीं और यह स्थान बेचूबीर धाम के रूप में प्रसिद्ध हो गया।


प्रशासन रहा पूरी तरह मुस्तैद

भीड़ को देखते हुए अहरौरा थानाध्यक्ष सदानंद सिंह के नेतृत्व में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए। मेला क्षेत्र को कई जोन और सेक्टरों में बाँटा गया। प्रतिदिन पुलिस गश्त, पैट्रोलिंग और निगरानी की व्यवस्था की गई। इसके बावजूद महानिशा के समय श्रद्धालुओं में अक्षत (चावल प्रसाद) प्राप्त करने को लेकर अफरा-तफरी का माहौल दिखा।

मेला आयोजन और व्यवस्था का संचालन अधिवक्ता रोशन लाल यादव और पुजारी दल द्वारा किया गया।


अंतिम दृश्य — आस्था का चरम

मनरी बजते ही वातावरण में रहस्यमयी ऊर्जा फैल गई।
श्रद्धालु रो पड़े।
कुछ झूमने लगे।
कुछ मौन हो गए।

हर नज़र बस बाबा की चौरी पर टिकी रही।

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