मुदस्सिर हुसैन IBN NEWS | मवई, अयोध्या
मवई, अयोध्या (4 मई 2025): मवई क्षेत्र में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के चौथे दिन शनिवार को प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कथावाचक आचार्य शांतनु जी महाराज ने समुद्र मंथन प्रसंग का अत्यंत मनोहारी व्याख्यान किया। उन्होंने कहा कि यह कथा न केवल धार्मिक ज्ञान देती है, बल्कि मानव जीवन के हर पहलू का संकेत भी करती है।
समुद्र मंथन से निकले 14 दिव्य रत्न
कथा में आचार्य शांतनु जी ने बताया कि जब महाराज परीक्षित ने सुखदेव जी से पूछा कि समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्न क्या हैं और उनका महत्व क्या है, तब उन्होंने विस्तार से समझाया:
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हलाहल विष – सबसे पहले विष निकला जिसे भगवान शिव ने पीकर नीलकंठ कहलाए।
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कामधेनु गाय – ऋषियों को प्रदान की गई।
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उच्चै:श्रवा घोड़ा – असुरराज बलि को मिला।
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ऐरावत हाथी – देवराज इंद्र को प्राप्त हुआ।
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कौस्तुभ मणि – भगवान विष्णु ने अपने कंठ में धारण की।
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कल्पवृक्ष – इच्छाओं को पूर्ण करने वाला वृक्ष।
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अप्सराएं (रंभा आदि) – स्वर्गलोक की शोभा बढ़ाने हेतु।
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महालक्ष्मी देवी – भगवान विष्णु ने वरण किया।
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वारुणी मदिरा – असुरों द्वारा अपनाई गई।
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चंद्रमा – शिव जी के मस्तक पर सुशोभित हुए।
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पारिजात वृक्ष – इंद्रलोक में स्थापित हुआ।
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पंचजन्य शंख – भगवान विष्णु के हाथों में शोभायमान।
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धनवंतरि भगवान – अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
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अमृत कलश – देवताओं और असुरों में संघर्ष का कारण बना।
मोहिनी अवतार और राहु-केतु की उत्पत्ति
कथावाचक ने आगे बताया कि जब अमृत कलश निकला, तब देवता और असुर दोनों उसे प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने लगे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर बड़ी चतुरता से देवताओं को अमृत पिला दिया। एक राक्षस स्वरभानु ने धोखे से अमृत पी लिया, जिसे भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से दो भागों में विभक्त कर दिया – उसका सिर राहु और धड़ केतु बना। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यही राहु-केतु आज भी सूर्य-चंद्र ग्रहण के कारक हैं।
श्रद्धालु हुए भावविभोर
इस गूढ़ ज्ञान और पौराणिक प्रसंगों की मनोहारी प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। आज की कथा में विशेष रूप से श्रीकृष्ण लीलाएं, गोवर्धन पूजा, और अन्य आध्यात्मिक प्रसंगों का भी उल्लेख हुआ, जिससे कथा प्रेमियों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।