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चुनाव तो हुये अपने तय समय में…लेकिन परीक्षायें रद्द : मनोज दुबे

 

ब्यूरो रिपोर्ट तीरथ पनिका IBN NEWS अनूपपुर मध्यप्रदेश

अनूपपुर – चलिये CBSE 12th की परीक्षा भी रद्द हो गई , पिछले दो माह से बना संशय भी खत्म हो गया, बड़ी-बड़ी बैठकें होती रहीं,सभी राज्यों की प्रादेशिक सरकारों से राय माँगी गई ,देश का बुद्धजीवी वर्ग भी अपनी चिन्तायें जाहिर करता रहा.कुछ राज्य सरकारों ने परीक्षाओं को रद्द करने की सिफारशें की, कुछ ने विभिन्न तरीकों से नाममात्र की परीक्षाओं का आयोजन करने का समर्थन किया ,तो कुछ ने अपने हितों को ध्यान में रखते हुये नैतिकता व मानवता की दुहाइयाँ दी और अब तो शायद ऐसा लग रहा है कि राज्य सरकारों को बस यही इंतजार था कि CBSE से शुरुआत तो हो जाये. ऐसा लगता था कि मानो राज्य सरकारें इसके लिये तैयार ही बैठी थी.

और अब राज्यों ने भी परीक्षाओं को रद्द करने का दौर शुरू कर दिया है कुल मिलाकर जिसको जो शूट किया अपने नफा नुकसान के अनुसार विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने अपने सुविधानुसार परीक्षाओं पर अपने अपने विचारों व सलाहों का आदान -प्रदान किया।नि:संदेह यह निर्णय स्वागत योग्य है, क्योंकि यह निर्णय काफी विचार मंथन के पश्चात हुआ होगा,।बेशक छात्र-छात्राओं को जीवन की रक्षा का ध्यान रखना सरकार की पहली प्राथमिकता है।लेकिन ऐसी बैठके आपदा के समय पिछले 2-3 माह पहले 5 राज्यों के चुनावी मौसम मे भी हुई होती यहाँ केन्द्र एवम् राज्यों के सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों के लिये नैतिक व मानवीय जिम्मेंदारियाँ थी कि लोगों के जीवन की रक्षा करना पहली प्राथमिकता हो लेकिन परीक्षाओं को रद्द करना ज्यादा ही आसान व सुविधाजनक था …

 

जिन परीक्षाओं से मानवीय व्यक्तित्व का विकास होता है, जिस शिक्षा व परीक्षाओं से एक सभ्य समाज व विवेकशील नागरिक का जन्म होता है.स्थानीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर एवम राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक का महत्व तय होता है एक बेहतर राष्ट्र की गरिमा का निर्माण होता है लेकिन परीक्षायें रद्द कर दी गई जबकि परीक्षाओं का आयोजन सम्पूर्ण कोरोना गाइड लाइन का पालन करा कर किया जा सकता था जो नहीं कराई गई लेकिन राज्यों में चुनाव कराया जा सकता है…पर परीक्षायें नहीं कराई जा सकतीं क्यों, क्योंकि स्कूल ,कालेज व यूनिवर्सिटीज की परीक्षाओं का संबंध व उसका भविष्य छात्र-छात्राओं से है नेताओं से नही है नेताओं के संबंध तो चुनावों से है जो हो रहें हैंपरीक्षाओं का आयोजन खतरनाक है! परीक्षाओं के लिये आपके पास आवश्यक संसाधन नहीं है.बच्चों की जिंदगी का सवाल है

 

लेकिन चुनावों में जिंदगी का सवाल नहीं है क्योंकि चुनावों का संबंध नेताओं से है इसलिये चुनाव आवश्यक था चुनाव तो निर्वाचन आयोग करा सकती है लेकिन परीक्षाओं का आयोजन शिक्षा मंत्रालय नहीं करा सकता ये कैसा तर्क है साहब परीक्षायें न हों इस तर्क का समर्थन करने वाले सभी महानुभाव उस समय कहाँ थे ,जब चुनावी सियासतों का दौर चल रहा था…तब ये सब चुनाव मे भाग लिये, उसके अहम् हिस्सेदार बने ,चुनाव लड़े , जीते भी और हारे भी.विधायक ,मंत्री ,मुख्यमंत्री बनना था ऐशो आराम मिलना थासरकारी सुख सुविधाओं को भोगना था बेशक चुनाव कराना उसकी सारी व्यवस्थायें करना निर्वाचन आयोग का कार्य है..,निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है उसके पास आपातकाल या अन्य विपरीत परिस्थितियों में चुनावों से संबंधित संवैधानिक अथिकार हैं,

 

उन अधिकारों का निर्वाचन आयोग प्रयोग कर सकती हैदूसरी तरफ संसद देश की सर्वोच्च संस्था है ,जिसके पास अपार संवैधानिक अधिकार है जिसका प्रयोग वह कर सकती है संवैधानिक नियमों का पालन करते हुये चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें हों या निर्वाचन आयोग हो या हर विषय पर सरकार का विरोध या बहिष्कार करने वाला विपक्ष हो क्यों नहीं विपक्ष के सभी लोग चुनावों का बहिष्कार कर दिये क्यों नहीं चुनावों के विरोध में आंदोलन किये हमेशा छोटी छोटी राजनीतिक गतिविधियों के विषय पर न्यायालय जाने वाले विपक्ष के लोग क्यों नहीं उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय चले गये इसलिये नहीं गये क्योंकि चुनाव राजनीतिक पार्टियों के लिये जरूरी है

 

अगर चुनाव हो सकते हैं तो परीक्षायें भी हो सकती हैं ,चुनावों में शत प्रतिशत कोरोना गाइड लाइन का पालन कराया भी नहीं जा सकता जैसे सभायें ,रैलियाँआदि चुनाव के सभी आवश्यक गतिविधियों मे या स्तर मे ये सम्भव नही थफिर भी चुनाव कराये गये चुनावों के लिये यदि 8 चरण हो सकतें है तो कम से कम परीक्षाओं को पूर्ण सुरक्षात्मक रूप से कोरोना गाइड लाइन का पालन करते हुये परीक्षायें भी 4-6 चरणों में बेहतर तरीके से कराई जा सकती थींकौन से कार्य करने हैं कौन से नहीं ,ये सब अपने हित के सुविधानुसार परिभाषित करके किये जाते हैंखैर जो भी हो रहा है परिस्थितियों को ध्यान मे रखकर ,बच्चों के जीवन के लिये निर्णय हुये है छात्र छात्राओं का शैक्षिक जीवन का बेहतर भविष्य क्या होगा? ..यह तो भविष्य का राज है काश इसी तर्ज पर , राज्यों में संपंन हुये चुनावों पर भी इतनी गंभीरता दिखाई गई होती ..उक्त बाते समाजिक विचारक मनोज दुबे ने कही

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