Ibn news Team DEORIA
दिनेश गुप्ता

देवरिया। शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विशेष धार्मिक महत्व है। नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा की गई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब चारों ओर अंधकार था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति और सृजन की देवी के रूप में पूजा जाता है।
मां कूष्मांडा की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि की रचना से पहले चारों ओर घना अंधकार व्याप्त था। उस समय मां कूष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। उनके स्वरूप में सूर्य के समान तेज विद्यमान है। मान्यता है कि मां सूर्यलोक में निवास करती हैं और अपनी दिव्य ऊर्जा से संपूर्ण संसार को प्रकाश प्रदान करती हैं। उनका नाम तीन शब्दों से जुड़ा माना जाता है—‘कू’ अर्थात छोटा, ‘उष्मा’ अर्थात ऊर्जा और ‘अंड’ अर्थात ब्रह्मांडीय अंड।
मां का दिव्य स्वरूप
मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, इसलिए उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र तथा वस्तुएं सुशोभित रहती हैं। उनके एक हाथ में जपमाला भी मानी जाती है। मां का वाहन सिंह है, जो शक्ति, साहस और निर्भीकता का प्रतीक है।
पूजा-अर्चना और मंत्र
नवरात्रि के चौथे दिन श्रद्धालु मां कूष्मांडा को पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित कर सुख-समृद्धि तथा उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने से भक्तों को साहस, ऊर्जा और सकारात्मकता प्राप्त होती है।
मां कूष्मांडा का मंत्र है—
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
मां कूष्मांडा का स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि जीवन में अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, आशा, विश्वास और सकारात्मक सोच से प्रकाश का मार्ग बनाया जा सकता है। नवरात्रि में उनकी आराधना शक्ति, सृजन और जीवन में नई ऊर्जा के संचार का प्रतीक मानी जाती है।