फरीदाबाद से बी.आर. मुराद की रिपोर्ट
फरीदाबाद: रमजान मुसलमानों के लिए इबादत का महीना है।
इस मुकद्दस महीने में मुसलमान रोजा रखते हैं और इबादत करके अल्लाह के साथ अपने रिश्ते को मजबूत करते हैं। रमजान 29 या 30 दिनों का होता है और इसे इस्लाम में तीन हिस्सों में बांटा गया है, जिसे ‘अशरा’ कहा जाता है। अरबी में अशरा का अर्थ 10 होता है। रमजान के पहले दस दिन (1-10) को पहला अशरा, दूसरे 10 दिन (11-20) को दूसरा अशरा और तीसरे दस दिन (21-30) को तीसरा अशरा कहा जाता है।
मौलाना मोहम्मद रफी सैफी ने बताया कि रमजान के शुरुआती 10 दिनों में, यानी पहले अशरे में, जो व्यक्ति रोजे रखकर नमाज अदा करता है, उस पर अल्लाह की रहमत बरसती है। वहीं, रमजान के दूसरे अशरे में लोग अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। रमजान के 11वें से 20वें रोजे तक चलने वाला यह दूसरा अशरा अल्लाह से माफी मांगने का समय होता है।
मौलाना मोहम्मद गुलाम मुस्तफा ने बताया कि यह अशरा माफी का होता है, और वर्तमान में दूसरा अशरा चल रहा है। इस दौरान लोग इबादत करके अपने गुनाहों की माफी पा सकते हैं। इस्लाम के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति रमजान के दूसरे अशरे में अपने गुनाहों की तौबा करता है, तो अन्य दिनों की तुलना में इस समय अल्लाह अपने बंदों को जल्दी माफ करता है।
रमजान का तीसरा अशरा 21वें रोजे से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे तक चलता है। इसे सबसे महत्वपूर्ण अशरा माना जाता है, क्योंकि इसमें शब-ए-कद्र जैसी पाक रात आती है, जिसमें की गई इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत के बराबर माना जाता है।