IBN News Team DEORIA
राकेश पाण्डेय
जाति जनगणना की मांग वर्षों पुरानी रही है, लेकिन मोदी सरकार ने इस पर अचानक घोषणा करके राजनीतिक हलचलों को तेज कर दिया है। खासकर तब जब पूरा देश पहलगाम हमले की त्रासदी से आक्रोशित था, उस समय सरकार का यह कदम कई सवाल खड़े करता है।
क्या यह निर्णय विपक्ष के दबाव का परिणाम है?
राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन लंबे समय से जाति जनगणना की मांग कर रहे थे। सरकार का यह कदम विपक्ष की वैचारिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे 90% पीडीए की एकजुटता की जीत बताया, वहीं आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि अब विधानसभा से लेकर संसद तक पिछड़ों के लिए सीटें आरक्षित होंगी।
जाति जनगणना की टाइमिंग पर उठे सवाल
जब पूरा गोदी मीडिया पहलगाम हमले को लेकर युद्ध की स्थिति बना रहा था, उस वक्त अचानक जाति जनगणना की घोषणा को लोगों ने ध्यान भटकाने की कोशिश माना है। बिहार चुनाव को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया गया—ऐसा भी विश्लेषण सामने आया है।
सरकार का रुख और यू-टर्न
अब तक जाति जनगणना को लेकर भाजपा नेताओं का रुख नकारात्मक रहा है। लेकिन अब केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि इससे समाज के सशक्तिकरण में मदद मिलेगी। उन्होंने इसे पारदर्शी बनाने की बात कही और विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे इसका राजनीतिक लाभ लेते रहे हैं।
🟢 विपक्ष की प्रतिक्रिया
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कांग्रेस: राहुल गांधी ने इस फैसले का स्वागत किया लेकिन साथ ही समय-सीमा और रोडमैप की मांग की।
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सपा: अखिलेश यादव ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।
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आरजेडी: तेजस्वी यादव ने वैचारिक जीत का दावा किया।
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वाम दल: CPl-M और CPI ने जनगणना की देरी और समय-सीमा तय करने की मांग की।
🔵 पहले कब हुई थी जाति जनगणना?
भारत में आखिरी बार संपूर्ण जाति जनगणना 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। 2011 में यूपीए सरकार ने एक सर्वे कराया, लेकिन उसके आंकड़े आज तक सार्वजनिक नहीं हुए। अब केंद्र ने इसे फिर से शुरू करने की घोषणा की है, लेकिन समय तय नहीं है।