मुदस्सिर हुसैन | IBN NEWS
मवई, अयोध्या: नया शिक्षा सत्र शुरू होते ही सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच शैक्षिक प्रतियोगिता अपने चरम पर पहुंच गई है। अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने की उम्मीद में स्कूलों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन शिक्षा अब सेवा नहीं, व्यापार बनती दिख रही है।
सरकारी स्कूल: व्यवस्था की बदहाली
सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में सरकार द्वारा बच्चों को मिड डे मील, मुफ्त यूनिफॉर्म और किताबें देने की योजनाएं भले ही चल रही हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे काफी अलग है। ब्लॉक मवई के कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक अपनी मर्जी से स्कूल आते हैं, समय की कोई पाबंदी नहीं। कुछ स्कूलों में तो शिक्षकों ने मिड डे मील योजना को ही अपनी दिनचर्या बना ली है।
सरकारी योजनाएं, लेकिन असरदार नहीं?
‘सर्व शिक्षा अभियान’ के अंतर्गत सरकार शत प्रतिशत नामांकन का लक्ष्य रख रही है, लेकिन अगर स्कूलों में शिक्षा का स्तर ही नहीं सुधरेगा, तो सिर्फ नामांकन से क्या होगा? बच्चे तो समय पर स्कूल पहुंच जाते हैं, लेकिन शिक्षक नहीं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता कैसे बेहतर होगी?
प्राइवेट स्कूल: लुभावने वादों की होड़
दूसरी तरफ, प्राइवेट स्कूल होल्डिंग्स, अखबारों और सोशल मीडिया पर विज्ञापन देकर अभिभावकों को आकर्षित कर रहे हैं। कंप्यूटर क्लास, इंग्लिश मीडियम, स्मार्ट क्लास जैसी सुविधाओं का दावा कर ये संस्थान ग्रामीण इलाकों में भी पैर पसार चुके हैं। हर गांव के चौराहे पर बिना मान्यता वाले स्कूल भी धड़ल्ले से चल रहे हैं।
अभिभावकों की दुविधा: सेवा बनाम व्यापार
आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावकों के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा कहां दिलाएं? एक ओर सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति, दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलों की महंगी फीस और खर्चे – ऐसे में उनका सपना अधूरा ही रह जाता है।
शिक्षा या व्यवसाय?
मवई ब्लॉक में सरकारी शिक्षकों की लापरवाही, विद्यालयों में समय पर उपस्थित न रहना और बच्चों की पढ़ाई में बाधा बन रही है। शिक्षा का ऐसा व्यापारिक स्वरूप अभिभावकों के सपनों को तोड़ रहा है और सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े करता है।