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बंगाल की राह पर उत्तर प्रदेश और मुस्लिम ठप्पे से पीछा छुड़ाने में लगे अखिलेश

विधानसभा 2022 के उलझते राजनैतिक समीकरण पर जनता की खामोशी

रिपोर्ट ब्यूरो गोरखपुर

गोरखपुर । ऐसी तस्वीरें और यही भगदड़ पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के मौके पर देखने को मिली थी जब एक के बाद एक टीएमसी के नेता अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम रहे थे।
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी कुछ ऐसी ही तस्वीरें आजकल देखने को मिल रही हैं जहां सत्ताधारी भाजपा के नेता और मंत्री लगातार समाजवादी पार्टी का दामन थाम रहे हैं।
चुनाव से ठीक पहले भाजपा में मची भगदड़ ने मतदातों को अचम्भे में डाल दिया है।
राजनैतिक मौसम का अनुमान लगाने में माहिर माने जाने वाले नेताओं ने जबसे समाजवादी पार्टी को अपना नया ठिकाना बनाना शुरू किया है तब से विपक्ष भाजपा को डूबता जहाज़ बताने में जुटा है।
अम्बिका सिंह से शुरू होकर पूर्वांचल के बाहुबली माने जाने वाले हरिशंकर तिवारी परिवार और फिर स्वामी प्रसाद मौर्या के बाद दारा सिंह चौहान का समाजवादी पार्टी का दामन थामने और कई विधायकों का भाजपा छोड़ सपा का हिस्सा बनने की खबरों के बीच मतदाता ये सोचने पर विवश हो रहा है अगर यही हाल रहा तो सत्ता परिवर्तन के बाद अवसरवादी नेता एक बार फिर सत्ता का सुख भोगेंगे।
दूसरी ओर अगर बात सपा की करें तो पिछले चुनाव तक इस पर मुस्लिम और यादव की पार्टी होने का ठप्पा लगा था लेकिन पहले आज़म खान के परिवार सहित जेल जाने पर पार्टी का मौन रहना उसके बाद फिर मुस्लिम बहन बेटियों को लेकर निहायत ही शर्मनाक बयान देने वाले पूर्वांचल के पूर्व हिन्दू वाहिनी नेता सुनील सिंह को पार्टी में शामिल करना और चुनाव से कुछ समय पहले मुख्तार और अतीक जैसे मुस्लिम चेहरों को अपराधी बता कर किनारा कर लेने और फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा भगवान परशुराम व भगवान कृष्ण पर मुखर होकर बयान इसी तरफ इशारा है कि सपा अब वो सपा नही रही जिसे मुलायम सिंह यादव ने खड़ा किया था। आज की सपा यानी समाजवादी पार्टी ने अपने चेहरे पर लगा मुस्लिम हितैषी मुखौटा उतारकर फेंक दिया है और अब वो भी भाजपा की परछांई बनने की राह पर चल पड़ी है।
पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी की मुस्लिम लीडरशिप की बात करें तो पूर्व मंत्री शाकिर अली और अहमद हसन के साथ ही वो दफन हो गई। डुमरियागंज में मलिक कमाल यूसुफ का परिवार और स्वर्गीय तौफीक अहमद की विरासत सम्भाले उनकी बेटी भी अखिलेश के एक ही दावं से ठिकाने लगने के करीब हैं। टिकट की लड़ाई के बाद शायद ये दोनों परिवार भी हाशिये पर चले जाएं।
बात गोरखपुर की करें तो गोरखपुर में कभी ज़फर अमीन डक्कू, मोहसिन खान और ज़ियाउल इस्लाम मुस्लिम नेतृत्व की पहचान हुआ करते थे । पार्टी स्थापना काल से ज़्यादातर समय जिलाध्यक्ष या नगर अध्यक्ष के पद पर हमेशा कोई न कोई मुस्लिम चेहरा काबिज़ रहा लेकिन 2022 के चुनाव से पूर्व अखिलेश पूरी तरह से खुद को और अपनी समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह और उनकी समाजवादी से अलग करना चाहते हैं। अखिलेश अपनी इस मुहिम में कितना कामियाब होते हैं ये समाजवादी पार्टी के टिकट बंटवारे के बाद ही पता चलेगा।
बहरहाल जनता की नज़र उन सब की ओर है जो इस चुनावी मौसम में अपनों को पराया और पराये को अपनाने में जुटे हैं । इस सबसे यही लग रहा है कि उत्तर प्रदेश भी तेज़ी से बंगाल बनने राह पर चल रहा है।

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