रिपोर्ट ब्यूरो
गोरखपुर। राही आर्ट एंड कल्चर फाउंडेशन के तत्वावधान में एक कवि सम्मेलन/मुशायरा का आयोजन किया गया, जिसमें आगंतुक कवियों/शायरों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। मुशायरे की निजामत अंर्तराष्ट्रीय शायर डा. कलीम कैसर ने एवं सदारत प्रो आरडी राय ने की।
वफ़ा’ गोरखपुरी ने अपना कलाम
मंज़िल पे जा के लोग हमें भूल ही गये, हम रास्ता बता के बहुत सोंचते रहे, पढ कर खूब बाहबाही बटोरी।
डा0 फ़रोज़ आलम ने पढा अजब फ़िजाओं का रूख़ हुआ है, ज़मीं की चादर सरक चुकी है, क़दम जहाँ पे मैं रख रहा हूँ, वहीं से लावा निकल रहा है।
डा0 संजय मिश्रा ‘शौक़’’ ने अपनी रचना ‘सदियों से चल रही है फ़ना और बक़ा की जंग, पीपल निकल रहा है मेरी छत को तोड़ कर’ पढ़ कर खूब तालियां बटोरीं।
डा0 ज्ञानेन्द्र द्विवेदी दीपक ने पढ़ा
ये सियासत की तालीम है, आम कहिये, भले नीम है, काटिये, सींचिये, काटिये, आदमी आज बरसीम है।
डा0 लोकेश शुक्ल ने पढ़ा, कम अज़ कम सर तो अपना तोड़ सकता,
तेरी तस्वीर अगर पत्थर की होती।
डा0 नीलिमा मिश्रा ने पढ़ा
मुझको आता है ज़माने के हर इक ग़म का इलाज, ज़ख़्म को फूल बनाने के लिए काफ़ी हूँ ।
डा परवेज़ अशरफ़ ने पढ़ा बहुत ही टाप का जूता है क्या किया जाए,
हमारी नाप का जूता है क्या किया जाए, किसी का होता तो मैं लेके भाग ही जाता, सनम के बाप का जूता है क्या किया जाए।
डा. तारिक़ अनवर ने पढ़ा किसी पे जान देना बहुत आसान है ‘तारिक़’, पता चल जायेगा तुमको भी कि मरने का मज़ा क्या है।
वैष्णवी सिकरवार ने पढ़ा इश्क़ के बीज को डाल दिया है मिट्टी में
उपजा तो वो मेरा वरना मिट्टी का।
नुसरत अतीक़ ‘गोरखपुरी’ ने पढ़ा
जो अना बेच के बैठे हैं यहाँ ऐ ‘नुसरत’ बात करते हैं हमेशा वही ख़ुद्दारी की।