राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पूरे किए 100 वर्ष, दूसरी शताब्दी में किया गया प्रवेश
मीरजापुर (अहरौरा)।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नगर अहरौरा ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में रविवार को भव्य पथ संचलन का आयोजन किया। कार्यक्रम का शुभारंभ पट्टिकला स्थित अनमोल एकेडमी मैदान से हुआ, जहां संघ के सैकड़ों स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में एकत्र हुए।
मुख्य अतिथि काशी प्रांत कार्यवाह मुरली पाल ने स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा कि “संघ का निर्माण संस्कृति की रक्षा और राष्ट्र के उत्थान के लिए हुआ है। परिवारों में संस्कार विकसित करना और देशहित में कार्य करना हम सभी का दायित्व है।”
उन्होंने आगे कहा कि डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा ब्रिटिश शासन के दौरान संघ की स्थापना “वंदे मातरम” के घोष के साथ की गई थी, जिसका उद्देश्य राष्ट्र में एकता, अनुशासन और आत्मसम्मान की भावना जगाना था।
मुरली पाल ने कहा कि संघ का कार्य ईश्वरीय और राष्ट्रनिर्माण का आधार है। जब भी देश पर संकट आया — चाहे 1962 के भारत-चीन युद्ध का समय रहा हो या प्राकृतिक आपदा का दौर — संघ के स्वयंसेवकों ने तन-मन-धन से राष्ट्रसेवा में अग्रणी भूमिका निभाई है।
🌸 नगर में पुष्प वर्षा और जयघोष
अनमोल एकेडमी परिसर से निकलते ही स्वयंसेवकों का अनुशासित पथ संचलन नगर के मुख्य मार्गों से होकर गुजरा। इस दौरान “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम” के नारों से पूरा नगर गूंज उठा।
नगरवासियों ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया। महिलाओं और व्यापारियों ने मार्गभर पुष्प वर्षा कर स्वयंसेवकों का अभिनंदन किया। विद्यालय परिसर लौटकर पथ संचलन का समापन किया गया।
👥 संगठन के प्रमुख पदाधिकारी रहे मौजूद
कार्यक्रम की अध्यक्षता सरदार जीत सिंह ने की। पथ संचलन में प्रमुख रूप से जिला प्रचारक आलोक, नगर संघचालक सत्यनारायण, नगर कार्यवाह अखिलेश, मुकेश, विवेक, संजय, जितेंद्र, लवकुश, कामेश्वर, ईश्वर, नगर पालिका अध्यक्ष ओमप्रकाश केशरी, राम जयश्री अग्रहरि, मंडल अध्यक्ष महेन्द्र अग्रहरि, कुमार आनंद सहित सैकड़ों स्वयंसेवक शामिल हुए।
🌿 पर्यावरण और संस्कार का संदेश
मुरली पाल ने अपने संबोधन में कहा —
“हमें पर्यावरण के अनुरूप जीवन जीना चाहिए। संघ व्यक्ति निर्माण के साथ-साथ समाज निर्माण का माध्यम है। देशहित में ही हमारा हित निहित है, इसे समझना प्रत्येक स्वयंसेवक का कर्तव्य है।”
📜 संघ के 100 वर्षों की गौरवगाथा
संघ के 100 वर्षों की इस ऐतिहासिक यात्रा में राष्ट्रवाद, सेवा और अनुशासन की परंपरा निरंतर मजबूत हुई है। अब आरएसएस ने दूसरी शताब्दी में प्रवेश किया है, जिसके साथ समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है।