राकेश पाण्डेय
त्वरित टिप्पणी :अपने कुकर्म को छिपाकर उसे ‘उत्सव’ में बदलने की कला में कोई पार्टी माहिर है, तो उस पार्टी का नाम भारतीय जनता पार्टी है। उसे न तो जुमलेबाजी करते शर्म आती है और न ही बड़ा गप्प (झूठ) बोलने में। यही इस पार्टी का चाल, चरित्र, चलन है।
नोएडा में इंडिया एक्सपो मार्ट में बोलते हुए परिधान मंत्री ने महंगाई के लिए कांग्रेस पर दोष लगाया, जबकि वे पिछले 11 सालों से राज कर रहे हैं और इन 11 सालों में कोई भी रोजमर्रा का सामान सस्ता होना तो दूर, बल्कि 2014 की तुलना में उसका दाम कम से कम दुगुना जरूर हो गया है।
उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, 2014/ अगस्त 2025 में दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें इस प्रकार थीं : मूंग दाल — 97.26 रुपये/ 112 रूपये प्रति किलोग्राम, उड़द दाल — 79 रुपये/ 140 रुपये, अरहर दाल — 75.83 रुपये/ 145 रुपये, आटा — 21 रूपये/ 37 रुपये, शक्कर — 26 रूपये/ 50 रुपए प्रति किलोग्राम था। पेट्रोल की कीमत 73.16 रुपये/ 100 से107 रुपए प्रति लीटर थी और डीजल 55.48 रुपये/ 93 से 96 रुपए प्रति लीटर था।
नॉन-बायोलॉजिकल परिधान मंत्री को अर्थशास्त्र का यह छोटा सा सूत्र भी नहीं मालूम कि महंगाई दर में वृद्धि का कम होना (जिसका दावा अक्सर उपभोक्ता मामलों का विभाग करता रहता है), महंगाई का कम होना नहीं होता। यदि महंगाई कम हुई होती, तो सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता देने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

2017 में भी महंगाई कम होने का जोर-शोर से उस समय ऐलान किया गया था, जब पूरे देश में ‘एक देश, एक टैक्स’ के रूप में जीएसटी लागू किया गया था। तब इसी भाजपा ने जीएसटी को महंगाई के खिलाफ रामबाण औषधि बताया था। लेकिन 8 साल बाद इसी सरकार को स्वीकार करना पड़ा है कि इस औषधि से महंगाई कम नहीं हुई है। अब चार स्लैबों में लगने वाली जीएसटी को दो स्लैबों तक सीमित करके ‘बचत उत्सव’ मनाया जा रहा है। इससे कुछ वस्तुओं के मूल्य में कमी जरूर आ सकती है, लेकिन यह आशा करना बेकार है कि महंगाई कम होगी और आम जनता की क्रय शक्ति बढ़ जाएगी।
पिछले 8 सालों में मोदी सरकार ने जीएसटी के रूप में 55 लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा टैक्स बटोरा है — यानी हर साल औसतन 7 लाख करोड़ रूपये। अब संशोधित जीएसटी से सरकार को लगभग 5 लाख करोड़ रुपए मिलेंगे और उसे लगभग 2 लाख करोड़ रुपयों का घाटा होगा। लेकिन यह इतनी बड़ी रकम नहीं है कि आम जनता की क्रय शक्ति में उछाल आ जाएं, क्योंकि यह सकल कर राजस्व का 10% से भी कम है। संशोधित जीएसटी से जिन वस्तुओं के दाम कम होने की आशा की जा रही है, उस पर सेस लगाने का अधिकार तो केंद्र के पास है ही। यदि राजस्व में होने जा रही कमी को वह चुपचाप सेस लगाने के जरिए पूरा करना चाहेगी, तो आम जनता को कुछ भी राहत नहीं मिलेगी। मोदी सरकार का यह मनपसंद रास्ता है, क्योंकि इससे होने वाली आय को राज्यों के साथ बांटना नहीं पड़ता।
‘एक देश, एक टैक्स’ का नारा लगाने वाली सरकार ने पेट्रोल-डीजल और अन्य पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा है। यदि पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाया जाएं, तो बाजार में इसकी कीमत वर्तमान से आधी ही रह जाएगी। सभी जानते हैं कि बाजार की महंगाई में सबसे बड़ा योगदान पेट्रोल और डीजल की कीमतों का ही है, क्योंकि यह महंगाई में उत्प्रेरक का काम करती हैं। यदि मोदी सरकार महंगाई को कम करने के प्रति थोड़ी भी ईमानदार होती, तो वह पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाती। लेकिन वह ऐसा नहीं करेगी, क्योंकि इन पर अनाप-शनाप टैक्स लगाकर वह हर साल 6 लाख करोड़ रुपयों की कमाई कर रही है और अपने राजस्व घाटे को पूरा कर रही है। इसका अर्थ है कि संशोधित जीएस से आम जनता को जितना राहत मिलने का सरकार दावा कर रही है, पेट्रोल डीजल की बढ़ी चढ़ी कीमतों के जरिए उससे तीन गुना ज्यादा वसूल कर रही है।
जीएसटी से मिलने वाली राहत की तुलना ट्रंप के टैरिफ से होने वाली मुसीबत से की जाए, तो यह राहत भी पानी में जाती नजर आती है, क्योंकि इस टैरिफ से जो महंगाई और बेरोजगारी पैदा हो रही है और आम जनता की क्रय शक्ति में जो भारी गिरावट आने वाली है, उसके मुकाबले राहत के ये छींटे कहीं नजर नहीं आएंगे।
यदि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था के इस संकट से जरा भी चिंतिंत होती, तो बचत उत्सव का नाटक नहीं करती। लेकिन मोदी की चिंता तो वे कॉर्पोरेट हैं, जिन पर वह इस देश की संपदा लुटा रही है।