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लेखक दिनेश गुप्ता पत्रकार

स्कूल की बढ़ती ट्यूशन फीस और शिक्षा के व्यापारीकरण पर एक व्यंग्य (Satire) नीचे दिया गया है:शिक्षा का ‘मॉल’ और ट्यूशन की ‘सेल’आजकल के ज़माने में बच्चा पैदा बाद में होता है, उसकी स्कूल और ट्यूशन की बुकिंग पहले हो जाती है। पुराने ज़माने में लोग गुरु दीक्षा देते थे, आज के ज़माने में माता-पिता “लोन की किस्त” देते हैं। शिक्षा अब ज्ञान का मंदिर नहीं, बल्कि एक आलीशान शॉपिंग मॉल बन चुकी है, जहाँ जितनी बड़ी ट्यूशन फीस, बच्चा उतना ही बड़ा “ज्ञानी” माना जाता है।एक मध्यमवर्गीय पिता का आधा जीवन तो सिर्फ यह समझने में निकल जाता है कि उसके बच्चे की स्कूल फीस बढ़ रही है या किसी मल्टीनेशनल कंपनी के शेयर! हर साल जब नया सेशन शुरू होता है, तो स्कूलों का नारा होता है—”विद्या धनं प्रधानम्” (विद्या ही सबसे बड़ा धन है), लेकिन फीस का बिल देखकर माता-पिता को लगता है कि स्कूल वाले कह रहे हैं—”तुम्हारा सारा धन अब हमारा है!”ट्यूशन की हालत तो यह है कि अब “होम ट्यूशन” का मतलब है कि टीचर आपके घर आकर आपके बजट की धज्जियाँ उड़ाएगा। अगर बच्चा क्लास में फेल हो जाए, तो गलती बच्चे की बुद्धि की है। लेकिन अगर बच्चा अच्छे नंबरों से पास हो जाए, तो क्रेडिट उस “महीने की मोटी फीस” को जाता है जो पापा ने अपनी जेब काटकर भरी थी।आजकल के ट्यूशन सेंटर्स की फीस देखकर तो ऐसा लगता है कि वो बच्चे को गणित और विज्ञान नहीं, बल्कि चाँद पर ज़मीन खरीदने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। विडंबना देखिए, बच्चा स्कूल में ६ घंटे पढ़ता है, फिर ट्यूशन में ३ घंटे पढ़ता है, और अंत में जब थककर सो जाता है, तो माता-पिता गर्व से कहते हैं—”हमारा बच्चा बहुत ‘कॉम्पिटिटिव’ हो रहा है!” सच तो यह है कि कॉम्पीटिशन बच्चे की पढ़ाई में नहीं, बल्कि माता-पिता की जेब और स्कूल के कैश काउंटर के बीच चल रहा है।अंत में यही कहा जा सकता है कि आज की ट्यूशन फीस वह ‘दवा’ है, जिसे खाकर बच्चा तो पास हो या न हो, लेकिन पिताजी का ब्लड प्रेशर ज़रूर पास (बढ़) हो जाता है!